श्रीमद् देवचन्द्र
देवचंद जिन पूजना, करतां भव पार
जिन पडिमा जिन सारखी, कही सूत्र मझार
आज प्रत्येक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन जिस स्नात्र पूजा की भावपूर्ण पंक्तियों को गुनगुनाता है उसके रचनाकार श्रीमद् देवचन्द्र जी हैं।
जैन साहित्य में चौबीस तीर्थंकरों पर रची गई चौबीसियों की संख्या सैकड़ों में है। परन्तु आज भी आनन्दघन जी तथा देवचन्द्र जी द्वारा रचित चौबीसियाँ भाव तथा आध्यात्मिक गहराई की दृष्टि से अनुपम हैं।
देवचन्द्र जी की गणना जैन विद्वानों की अग्रिम पंक्ति में होती है। 18वीं शताब्दी के अध्यात्मनिष्ठ विद्वानों में श्रीमद् देवचन्द्र जी का स्थान सबसे ऊँचा है।
पूज्यश्री के पिता लूणिया गोत्रीय तुलसीदास जी थे और माता का नाम धनदेवी था। जब आप गर्भ में थे तब माता-पिता ने खरतरगच्छीय वाचक श्री राजसागरजी महाराज सा के पास प्रतिज्ञा ली की यदि पुत्र का जन्म होगा तो उसे जैन शासन की सेवा में अर्पण कर देंगे।
कहा जाता है की जब आप गर्भ में थे, तब माता ने स्वप्न में सुमेरु पर्वत पर इंद्रों द्वारा प्रभु के जन्मोत्सव का दृश्य देखा। कुछ ही दिनों में जब गच्छनायक जिनचन्द्रसूरि जी का आगमन हुआ तब माता-पिता ने उनके समक्ष स्वप्न की चर्चा की। प्रसन्न होकर आचार्यश्री ने कहा कि आपको एक महान भाग्यशाली पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी – जो या तो छत्रपति होगा या सर्व विद्यानिधान पत्रपति होगा।
जब धरती का पुण्य जागता है तब महान आत्मसाधक अध्यात्मयोगी श्रीमद् देवचन्द्र जी जैसी विभूतियाँ अवतीर्ण होती है। पूज्यश्री का जन्म सम्वत 1746 में बीकानेर के निकट एक ग्राम में माता धनदेवी की रत्नकुक्षि से हुआ। आपका जन्म नाम देवचन्द्र रखा गया।
सम्वत 1756 में 10 वर्ष की लघु वय में देवचन्द्र जी की दीक्षा वाचकवर्य श्री राजसागरजी महाराज सा के कर कमलों से हुई। आपको श्री दीपचन्द्र जी का शिष्य घोषित किया गया। आपका दीक्षा नाम राजविमल रखा गया, परन्तु आप देवचन्द्र जी के नाम से ही प्रसिद्ध हुए।
तत्पश्चात, आपकी तीक्ष्ण बुद्धि देखकर राजसागर जी ने स्वयं के द्वारा सिद्ध सरस्वती मंत्र मुनि राजविमल (देवचन्द्र जी) को प्रदान किया। देवचन्द्र जी ने बिलाड़ा ग्राम के बेना तट के भूमिग्रह में मंत्र साधना कर सरस्वती देवी को सिद्ध किया।
सरस्वती देवी की असीम कृपा ने पूज्यश्री की प्रज्ञा को परिपक्व एवं निर्मल बना दिया। वाचक राजसागर जी, पाठक ज्ञानधर्म जी एवं दीपचन्द्र जी महाराज सा ने मुक्त ह्रदय से आपको ज्ञान दान दिया।
देवचन्द्र जी ने कम समय में ही व्याकरण, काव्य-कोष, छंद-अलंकार, न्याय-दर्शन, ज्योतिष कर्म साहित्य एवं आगम साहित्य का गहराई से अध्ययन किया। ज्ञानोपासना की तीव्र लगन में पूज्यश्री ने दिगंबर ग्रंथों का भी अवलोकन किया। आपने तत्वज्ञान में विशेष निपुणता प्राप्त की और उसमें भी द्रव्यानुयोग के गंभीर रहस्यों के ज्ञाता बने।
ज्ञानस्य फलं विरति – अर्थात ज्ञान का फल है विरति। जैसे-जैसे पूज्यश्री की ज्ञानोपासना दृढ बनती गयी वैसे-वैसे उनकी संयम साधना कठोर बनती गयी। इसी कारण से छोटी उम्र में ही आपका झुकाव अध्यात्म और योग की ओर हुआ।
देवचन्द्र जी की विद्वता पर कवियण ने कहा है –
सकल शास्त्र लायक थया हो
जेहने थयुं मइं सुइ ज्ञान रे
श्रीमद् देवचन्द्र जी बहुत बड़े शास्त्रज्ञ थे। धर्म-संघ ने उनकी विद्वत्ता और योग्यता देखकर उन्हें उपाध्याय पद प्रदान किया। उन्होंने जीवन में कई बार शास्त्रार्थ किए और हर बार विजयी रहे।
उनका विहार क्षेत्र बहुत विशाल था। उन्होंने सिंध, मुल्तान, सौराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मेवाड़, मालवा आदि कई प्रदेशों में विचरण किया। सम्वत 1777 में श्रीमद् ने गुजरात की ओर विहार किया, जहां न केवल स्थानीय संघों की विनंती थी बल्कि गुणानुरागी तपागच्छीय मुनि क्षमाविजय जी का भी नम्र आग्रह था।
पाटण नगर में उनकी विद्वत्ता और नम्रता से प्रभावित होकर तपागच्छीय आचार्य ज्ञानविमलसूरि जी उनके घनिष्ठ मित्र बन गए। एक राजस्थानी संत की प्रवचन पटुता एवं मधुर वाणी सुनकर पाटणवासी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनके जीवन और उपदेशों में न तो अहं भाव था न ममत्व, केवल समभाव का ही अमृत झरता था।
श्रीमद् की विद्वता, गुणदृष्टि और ह्रदय की विशालता से आकर्षित होकर, जैन धर्म के सभी सम्प्रदायों के मुनिजन उनके पास सैद्धांतिक अध्ययन एवं तात्विक समस्याओं के समाधान के लिए आया करते थे। तपागच्छ के प्रसिद्द साहित्यकार जिनविजय जी, कविवर उत्तमविजय जी, विलक्षण बुद्धि सम्पन्न विवेकविजय जी आदि महात्माओं ने श्रीमद् के पास अध्ययन किया था।
उनका ज्ञानदान साधुओं तक ही सीमित नहीं था। वे आत्मार्थी गृहस्थों को भी मुक्त ह्रदय से ज्ञान देने में तत्पर रहते थे।
धन्य है श्रीमद् को जिन्होंने उदारता पूर्वक ज्ञानदान तो दिया, लेकिन कभी किसी को अपना शिष्य बनाने के स्वार्थ से नहीं किया।
कवियण ने कहा है –
गच्छ चौरासी मुनिवरु रे, लेवा आबे विद्यादान
नाकारो नहीं मुख थकी रे, नय उपनय विधान रे
श्रीमद् के समय में जैन साधुओं के आचार में फिर से शिथिलता आ गई थी। सुविहित परंपरा के संस्कारों को विरासत में पाने वाले देवचन्द्र जी को इसका बहुत दुःख था। इसलिए संवत 1777 में आपने क्रियोद्धार कर उस शिथिलता को दूर किया और त्यागमय जीवन का उच्च आदर्श प्रस्तुत किया। इस कारण कठोर साधु जीवन अपनाने वाले केवल 8–10 शिष्य और प्रशिष्य ही आपके साथ टिक पाए।
श्रीमद् तीर्थंकरों को ही नहीं, उनकी प्रतिमाओं को भी साधना का आदर्श मानते थे। यही कारण था कि उनकी अतिशय-युक्त तीर्थों के प्रति गहरी श्रद्धा थी। विभिन्न मंदिरों के शिलालेखों से पता चलता है कि देवचन्द्र जी ने राजनगर, नवानगर, लींबडी, ध्रांगध्रा, चूड़ा आदि स्थानों पर अनेक मंदिरों और प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की थी।
शत्रुंजय पर्वत की खरतरवसही टूंक के एक शिलालेख के अनुसार श्रीमद् ने संवत 1783 में वहाँ प्रतिष्ठा की थी। अहमदाबाद की हाजा पटेल पोल में भी संवत 1784 में उनके हाथों सहस्त्रफणा पार्श्वनाथ भगवान की प्रसिद्ध प्रतिमा की प्रतिष्ठा हुई थी। इसके बाद श्रीमद् ने संवत 1785, 1786 और 1787 में शत्रुंजय पर अनेक जिनबिंबों की प्रतिष्ठा कर तीर्थ की महिमा और बढ़ाई।
कापरड़ा जिनालाय के निर्माता भानाजी भंडारी के वंशजों के संवत 1794 के शिलालेख में उल्लेख है कि देवचन्द्र जी ने शत्रुंजय, गिरनार, आबू और कापरड़ा आदि स्थानों पर प्रतिष्ठाएँ की थीं।
कवियण ने अपनी रचना ‘देवविलास’ में लिखा है कि देवचन्द्र जी ने संवत 1795 और 1810 में पालीताणा में प्रतिष्ठाएँ की थीं।
जिनमंदिर और तीर्थ उनके आस्था-केन्द्र थे। उन्होंने सौ से अधिक गीतों में तीर्थों और तीर्थाधिपतियों की मुक्तकन्ठ से स्तुति की है। श्रीमद् अपने प्रवचनों में भी बार-बार तीर्थ-महात्म्य का वर्णन करते थे।
सिद्धाचल के प्रति देवचन्द्र जी के मन में विशेष समर्पण भाव था।
श्रीमद् ने शत्रुंजय के उद्धार हेतु प्राण-प्रण से श्रम किया और गाँव-गाँव जाकर प्रवचनों के माध्यम से सिद्धाचल की महिमा का प्रचार किया। तीर्थ के वास्तुशिल्प को अक्षुण्ण बनाए रखने में आपके प्रयास ऐसे रहे जिन्हें इतिहास कभी भुला नहीं पाएगा।
पूज्यश्री के सदुपदेश से सिद्धाचल पर खरतरवसही में विशाल स्तर पर जीर्णोद्धार एवं चित्रकारी का कार्य हुआ। ‘श्री देवचन्द्र पद्य-पियूष’ में साध्वी हेमप्रभाश्री जी महाराजसा ने लिखा है कि इसका उल्लेख खरतरवसही की दाहिनी ओर स्थित खुली जगह में प्रतिष्ठित सिद्धचक्र शिला पर मिलता है।
शत्रुंजय तीर्थोद्धार के लिए श्रीमद् ने गुजरात के श्रेष्ठियों और कार्यकर्ताओं से सक्रिय संपर्क किया। आपकी प्रेरणा से अहमदाबाद, सूरत, खंभात, भावनगर आदि विभिन्न संघों में निधि-संग्रह हुआ। संवत 1781 से 1783 तथा पुनः 1785 से 1786 तक शत्रुंजय उद्धार का कार्य व्यापक स्तर पर संपन्न हुआ।
कवियण ने लिखा है –
तीर्थ माहात्म्य नी प्ररूपणा गुरुतणी, सांभले श्रावकजन्न
सिद्धाचल उपर नवनवा चैत्यनो, जीर्णोद्धार करे सुदिन्न
शत्रुंजय तीर्थ और उसके जीर्णोद्धार के कार्यों में आपकी ऐसी लगन थी कि अपने अंतिम समय तक आप शत्रुंजय, गिरनार, सूरत, खंभात, अहमदाबाद आदि क्षेत्रों में ही विचरण करते रहे।
सिद्धाचल इतना प्राचीन एवं पवित्र तीर्थ होते हुए भी, तीर्थ की सुचारु व्यवस्था के लिए उस समय कोई सुसंगठित संस्था या पेढ़ी नहीं थी। वहां के पुजारी तीर्थ पर एकाधिकार जमाये बैठे थे। व्यवस्था की दृष्टि से वास्तव में तीर्थ की दशा बड़ी दयनीय थी।
श्रीमद् ने संवत 1779 में खंभात के चातुर्मास में, शत्रुंजय महात्म्य की व्याख्या करते हुए, तीर्थोद्धार के लिए सचोट उपदेश दिया। फलस्वरूप उसी वर्ष तीर्थ व्यवस्था हेतु सिद्धाचल पर एक कारखाने का गठन हुआ।
पहले के समय में, “कारखाना” शब्द उस तीर्थ प्रबंधन समिति के लिए उपयोग होता था जो तीर्थ की व्यवस्था संभालती थी।
आणंदजी कल्याणजी पेढी के पुराने बही खाते में कारखाना शब्द का प्रयोग किया गया है। आज से 50 वर्ष पूर्व तक शंखेश्वर की पेढी के साथ कारखाना शब्द जुड़ा हुआ था। कुछ सालों पहले तक महुडी, अजाहरा, भोयणी आदि तीर्थ स्थानों के मंदिरों की प्रबंध समितियों के नाम के साथ भी कारखाना शब्द का उपयोग किया जाता था।
पेढ़ी की स्थापना के बारें कवियण कहते हैं –
कारखानोतिहाँ सिद्धाचल उपरे मंडाव्यो महाजन्न
द्रव्य खरचाये अगणित गिरीउपरे, उल्लसित थयोरे तन्न
कवियण के उल्लेख अनुसार सिद्धाचल पर देवचन्द्र जी की प्रेरणा से महाजन लोगों ने एक ऐसा कारखाना (पेढी) संस्थापित किया, जिसने बहुत सारा धन लगाकर तीर्थोद्धार किया।
अनेक परिवर्तनों से गुजरती हुई उस पेढी/कारखाने का विकसित रूप वर्तमान की इस आणंदजी कल्याणजी पेढी को कह दिया जाए तो अनुचित नहीं होगा।
देवचन्द्र जी ने अनेक बार शत्रुंजय की यात्राएं की और वहां के लिए पैदल चतुर्विध संघ निकलवाए। आपके सान्निध्य में तीर्थराज के तीन संघ निकलने का उल्लेख मिलता है। सम्वत 1804 में सूरत के शाह कचरा कीका और रूपचंद ने उत्साहपूर्वक शत्रुंजय का संघ निकाला था, जिसका वर्णन श्रीमद् ने अपने सिद्धाचल स्तवन में किया है।
श्रीमद् बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनका प्रभाव केवल उस समय ही नहीं, बल्कि उनके बाद के समय में भी तथा आज तक दिखाई देता है।
उस समय स्थानकवासीयों के प्रभाव से गुजरात के कई स्थानों में लोगों में मूर्तिपूजा के प्रति अश्रद्धा फैल गई थी। इसके परिणामस्वरूप मंदिरों की स्थिति बहुत खराब हो गई और घोर आशातना हो रही थी। यह देखकर श्रीमद् को बड़ी पीड़ा हुई। अतः उन्होंने मूर्ति पूजा के विरोधियों की गतिविधियों का उन्मूलन कर “जिन प्रतिमा जिन सारखी” का अभियान आगे बढ़ाया।
स्थानकवासीयों के प्रभाव से अहमदाबाद के सेठ माणकलालजी की मूर्तिपूजा से श्रद्धा उठ गई थी। जब वे श्रीमद के संपर्क में आये तब पूज्यश्री के तर्क और तत्वपूर्ण व्याख्यान सुनकर पुनः मूर्तिपूजक बन गए। माणकलालजी ने सम्वत 1784 में एक जिन मंदिर बनवाया जिसकी प्रतिष्ठा श्रीमद के हाथों हुई।
सम्वत 1796-97 में नवानगर (जामनगर) में श्रीमद् ने आगम और युक्तियों के आधार पर स्थानकवासियों के सामने मूर्तिपूजा की सत्यता सिद्ध की। इसके परिणामस्वरूप लोगों की मूर्तिपूजा में श्रद्धा दृढ़ हुई और मंदिरों में फिर से दर्शन-पूजन शुरू हुए।
अहमदाबाद के एक ज्ञानी सेठ आणंदरामजी स्थानकवासी बन गए थे। वे श्रीमद् के पास आकर तत्त्व चर्चा किया करते थे। देवचन्द्र जी के गहन ज्ञान से प्रभावित होकर वे फिर से मूर्तिपूजक बन गए और उनके भक्त हो गए।
शासक वर्ग को धर्म प्रेमी बनाना धार्मिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण बात है।
सेठ आणंदरामजी ने अहमदाबाद के तत्कालीन सूबेदार, जोधपुर निवासी रतन सिंह भंडारी का गुरुदेव से संपर्क कराया। देवचन्द्र जी के गहन तत्वज्ञान से प्रभावित होकर रतन सिंह प्रतिदिन पूजा-अर्चना करने लगे।
सम्वत 1804 में भावनगर के महाराज भावसिंह भी आपसे प्रभावित होकर आपके परम भक्त बन गए। परछरी और राणाबाव के ठाकुरों को श्रीमद् ने प्रतिबोध देकर धर्मप्रेमी बनाया। धोलका के योगिराज पुरुषोत्तम भी आपसे प्रभावित होकर जैन धर्मानुरागी बन गए थे।
संवत 1812 में देवचन्द्र जी का चातुर्मास अहमदाबाद में हुआ। इसी चातुर्मास के दौरान श्रीमद् व्याधिग्रस्त हो गए। पूज्यश्री ने अपने शिष्य – प्रशिष्य परिवार के संयम जीवन के निर्वाह का उत्तरदायित्व बड़े शिष्य मनरूप जी को सौंपा।
सकल शिष्य भेला करी, गुरुजीये हो सहुने थाप्यो हाथ
प्रयाण अवस्था अम तणी, वाणी केहवी हो जेहवो गंगापाथ
संवत 1812 की भाद्रपद अमावस्या की रात्रि में श्रीमद् देवचन्द्र जी का समाधि-मरण हुआ। इसके पश्चात सभी गच्छ के श्रावकों ने मिलकर आपके पवित्र देह का अग्नि-संस्कार किया। बाद में श्रीसंघ ने आपकी पावन स्मृति में एक सुंदर स्तूप का निर्माण करवाया और वहाँ आपकी चरण-पादुकाओं की स्थापना हुई।
वर्तमान में ये चरण-पादुकाएँ अहमदाबाद के हरीपुरा स्थित जैन उपाश्रय में विराजमान हैं।
श्रीमद् देवचन्द्र जी के उत्कृष्ट त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य एवं आत्म-साधना के पुण्य प्रभाव से उनके जीवन में अलौकिक शक्तियाँ प्रगट हो गयी थी।
दीक्षा लेने के बाद छोटी उम्र में ही आपके उच्च आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ हो गया था। एक बार श्रीमद् कायोत्सर्ग ध्यान में लीन थे तभी उनके शरीर पर सांप चढ़ गया। यह देखकर साथी मुनिराज घबरा गए परन्तु देवचन्द्र जी जरा भी विचलित नहीं हुए। जब काउस्सग्ग पूर्ण हुआ तब सर्प शरीर पर से उतरकर सामने बैठ गया। पूज्यश्री ने उसे मधुर शब्दों में समभाव का उपदेश दिया। सांप ने भी अपने फणों को इस प्रकार हिलाया कि मानो समता रस में झूम उठा हो। यह घटना श्रीमद् के जीवन की निर्भय दशा की सूचक है।
देवचन्द्र जी एक बार पंजाब प्रान्त में पर्वत के निकटवर्ती रस्ते से विहार कर रहे थे। उस मार्ग पर एक सिंह का भयंकर आतंक था। लोगों के मना करने पर भी आप मार्ग पर निडरता से आगे बढ़े। जैसे ही श्रीमद् उस सिंह के समीप पहुँचे, वह गर्जना करने लगा। परंतु पूज्यश्री से दृष्टि मिलते ही वह क्षण भर में शांत हो गया। इस घटना से यह पता चलता है कि महात्माओं की सात्विकता और पवित्रता के प्रभाव से आसुरी भाव वाले प्राणी भी शांत हो जाते हैं।
सम्वत 1788 में अहमदाबाद में मृगी उपद्रव फैलने पर, सूबेदार रतनसिंह भंडारी की विनती स्वीकार कर श्रीमद् ने रोग उपशांत किया। कुछ वर्षों पश्चात, सम्वत 1804 में भावनगर में चातुर्मास कर देवचन्द्र जी ने पालीताना में फैले मृगी उपद्रव को भी शांत किया।
सम्वत 1793 में मराठा सरदार रणकुजी ने विशाल सेना के साथ अहमदाबाद पर चढ़ाई की। देवचन्द्र जी की कृपा से अल्प सेना होते हुए भी सूबेदार रतनसिंह भंडारी गुजरात को बचाने में सफल हुए।
आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरि जी ने अपनी पुस्तक “श्रीमद् देवचन्द्र – भाग 2” में उल्लेख किया है कि एक बार राजस्थान में संघ-जीमण के प्रसंग पर, श्रीमद् ने गौतमस्वामी के ध्यान-प्रभाव से, 1000 व्यक्तियों की रसोई में 8000 व्यक्तियों को भोजन कराया।
आत्मा की अनंत शक्ति को जागृत करने वाले महापुरुष क्या नहीं कर सकते! यह बात गुजरात के जामनगर में घटित एक चमत्कारिक घटना से सिद्ध होती है।
पूर्वकाल में जामनगर में मुसलमानों का प्रभाव बढ़ जाने पर श्रावकों ने प्रतिमाओं को समय रहते मंदिर के भोंयरे में सुरक्षित रख दिया। मुसलमानों ने बलपूर्वक उस मंदिर पर कब्ज़ा कर लिया और उसे मस्जिद के रूप में उपयोग में लाने लगे।
कालांतर में मुसलमानों का प्रभुत्व घटा और हिंदू राज्य पुनः स्थापित हुआ। तब जैनों ने उस मंदिर का अधिकार वापस प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयास किए, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।
सौभाग्य से वहाँ देवचन्द्र जी पधारे। श्रावकों ने उनके समक्ष यह समस्या प्रस्तुत की। श्रीमद् ने राजदरबार में यह सिद्ध करने के प्रयास आरम्भ किए कि वह स्थान मूलतः जैन मंदिर ही है। अंततः राजा ने निर्णय दिया कि मंदिर को ताला लगा दिया जाए और जिसके इष्ट-देव के नाम की प्रभावना से ताला खुलेगा, वह स्थान उसी को प्रदान किया जाएगा।
पहला अवसर मुसलमानों को दिया गया, पर ताला नहीं खुला। जब श्रीमद् की बारी आई, तब उन्होंने जिनेंद्र परमात्मा की भावपूर्ण स्तुति की और ताला सहसा टूटकर नीचे गिर पड़ा। बाद में भोंयरे की प्रतिमाओं की मंदिर में विधिवत पुनः प्रतिष्ठा की गई।
जामनगर के राजा और प्रजा इस चमत्कार से अत्यंत प्रभावित हुए और सर्वत्र जैन धर्म तथा श्रीमद् देवचन्द्र जी की प्रशंसा हुई।
वस्तुतः संयमी महात्मा अपनी शक्तियों का इधर-उधर प्रदर्शन नहीं करते, न ही उन्हें उन शक्तियों का कोई मोह होता है। शुद्ध आत्मदशा के अतिरिक्त जगत की सब वस्तुएँ उनके लिए तुच्छ हैं। संघ-शासन के लाभ हेतु वे कभी-कभी अपनी शक्तियों का परिचय दे देते हैं, अन्यथा नहीं।
एक बार मारवाड़ के मोटा कोटमरोट में चातुर्मास के दौरान महोपाध्याय यशोविजयजी द्वारा रचित ‘ज्ञानसार’ ग्रंथ पर श्रीमद् देवचन्द्र जी अपने आत्मानुभव की गहराई में उतरकर अद्भुत व्याख्यान दे रहे थे। उन व्याख्यानों में एक वृद्ध ब्राह्मण भी प्रतिदिन आता था। वह कहाँ से आता था और कहाँ जाता था यह कोई नहीं जान पाता था।
एक रात वह ब्राह्मण उपाश्रय में आकर श्रीमद् को वंदन कर बोला – “मैं धरणेंद्र हूँ। आत्मस्वरूप पर आपके व्याख्यान मैंने चार मास श्रवण किये हैं। इस काल में भी भरत क्षेत्र में आप तीर्थंकरों की तरह आत्मस्वरूप की व्याख्या कर रहे हैं, इससे मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ।”
इसके बाद धरणेंद्र देव ने देवचन्द्र जी से कुछ माँगने को कहा। इस पर श्रीमद ने कहा – “आत्मिक शुद्धोपयोग के सिवाय मुझे किसी भी दूसरी वस्तु का खप नहीं है।”
उनकी निष्पृहता से प्रसन्न होकर धरणेंद्र ने वहाँ उपस्थित सभी साधुओं के समक्ष अपनी सत्यता प्रमाणित करने हेतु अपना उत्त्तर वैक्रिय शरीर प्रकट किया, जिससे वहाँ उपस्थित सभी की आँखें चकाचौंध हो गईं।
यद्यपि अध्यात्मयोगी कभी भी देवताओं की निरर्थक आराधना नहीं करते, फिर भी उनके गुणों से आकृष्ट होकर देवगण स्वयं उनका सान्निध्य प्राप्त करते हैं।
मणिलाल पादराकर के एक लेख के अनुसार, देवचन्द्र जी ने सिद्धाचल पर कौवों का आना बंद कराया था। दुषम काल के प्रभाव से उस समय सिद्धाचल पर कौवे आने लगे थे। इस महान तीर्थ पर कौवों का आना अशुभ माना जाता है। कौवों के उपद्रव को रोकने के लिए कई प्रयास किए गए पर सब व्यर्थ गए।
संवत 1804 में शाह कचरा कीका के संघ के साथ जब देवचन्द्र जी सिद्धाचलजी पधारे, तब श्रीसंघ की विनती पर उन्होंने वहाँ शांतिस्नात्र कराया और पर्वत के चारों ओर शांति-जल की धारा प्रवाहित करवाई, जिससे कौवों का आना बंद हो गया। इस चमत्कार से सर्वत्र आनंद और शांति छा गई।
प्रभुजी ने अवलंबता, निज प्रभुता हो प्रगटे गुणरास ।
देवचन्द्र नी सेवना, आपे मुज हो अविचल सुखवास ॥
प्रभु आलंबन रूप है। उनके निमित्त से अपनी प्रभुता प्रकट होती है। ऋषभदेव परमात्मा के स्तवन की इस गाथा में देवचन्द्र जी ने यही भाव स्पष्ट किया है।
श्रीमद् उच्च कोटि के परमात्म भक्त थे। आपकी भक्ति पर जैन तत्वज्ञान का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। देवचन्द्र जी की भक्ति के आधारभूत मुख्य तीन तत्व है – प्रभु की प्रभुता, अपनी लघुता और परमात्मा के प्रति अनन्य समर्पण भाव।
“देवचन्द्र चौबीसी” श्रीमद् की अत्यन्त लोकप्रिय रचना है। इसके 24 स्तवनों में जैन शास्त्रों में निर्दिष्ट अनेक गंभीर तत्वों के रहस्य को सरल भाषा में प्रस्तुत कर जिन भक्ति का तात्विक मार्ग बताया गया है।
जैन दर्शन के अनुसार परमात्मा वीतराग है। तब उनकी भक्ति की क्या उपयोगिता हो सकती है? इसकी व्याख्या जिस सफलता के साथ श्रीमद् ने अपने स्तवनों में की है वह अन्यत्र दुर्लभ है। यही उनकी महान विशेषता है।
इस चौबीसी पर अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखी हैं। इसके स्तवन कल्पना की कोरी उड़ान मात्र नहीं हैं, किन्तु स्वानुभव की गहराई से निकले हुए लब्धि वाक्य हैं। इसीलिये उनका एक एक शब्द हृदय पर सीधा असर करता है।
तुम प्रभु तुम तारक विभु जी, तुम समो अवर ना कोय ।
तुम दरिसण थकी हुं तर्यो जी, शुद्ध आलंबन होय ।।
श्रीमद् देवचन्द्र रचित स्नात्र पूजा अत्यंत आकर्षक व भावपूर्ण है।
जब आप गर्भ में थे तब माता धनदेवी ने स्वप्न में देखा था कि चौसठ इन्द्र मेरु पर्वत पर तीर्थंकर भगवान का जन्माभिषेक कर रहे हैं। ‘श्री देवचन्द्र पद्य-पियूष’ में साध्वी हेमप्रभाश्री जी महाराजसा लिखते हैं कि मानों उस दृश्य को चिरंजीवी बनाने के लिये ही आपने स्नात्रपूजा की रचना की हो।
वस्तुतः आपकी ‘स्नात्रपूजा’ इतनी भावपूर्ण है कि गाते-गाते एक के बाद एक सारा दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है और करनेवालों को लगता है कि वे साक्षात् जन्माभिषेक में सम्मिलित हो रहे हैं। स्नात्र पूजा के दोहे बोलते-बोलते करनेवाले के शुभ परिणाम की धारा सचमुच बढ़ने लगती है –
पुत्र तुम्हारो धणीय हमारो, तारण-तरण जहाज
मात जतन करी राखज्यो एहने, तुम सुत अम आधार
यह कड़ी बोलते ही रोमांच हो जाता है। हृदय ऐसे पवित्र एवं मधुर भावों से भर जाता है जो अवर्णनीय है।
आपसे पूर्व श्रावक कवि ‘देपाल’ ने स्नात्र पूजा रची थी तथा 13वीं सदी में आचार्य जयमंगलसूरि ने महावीर जन्माभिषेक बनाया था। लेकिन जो उच्च एवं मधुर भाव प्रवणता श्रीमद् की पूजा में है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
वस्तुतः श्रीमद् की स्नात्र पूजा अजोड़ और बेजोड़ है। इसमें भक्ति का जो अखण्ड प्रवाह प्रवाहित हुआ वह इतना सघन है, कि इसके बाद जो स्नात्र पूजाएँ बनी वे आपकी पूजा की आनुवाद मात्र ही प्रतीत होती हैं।
स्नात्र पूजा के अन्त में श्रीमद् कहते हैं कि –
देवचंद निज भक्तें गायो, जन्म महोच्छव छंद
बोध बीज अंकूरो उलस्यो, संघ सकल आणंद
अर्थात् इस जन्म महोत्सव के छन्द को जो भव्यात्मा आदरेगा, उसके हृदय में बोधि बीज (समकित) प्रकट होगा। इसकी सत्यता, अर्थ के विवेक सहित स्नात्र पूजा करने वाले भक्त प्रतिदिन प्रमाणित कर रहे हैं।