आचार्य जिनराजसूरि – द्वितीय

आचार्य जिनसिंहसूरि जी के पट्टधर श्री जिनराजसूरि जी हुए। आपका जन्म बीकानेर निवासी बोथरा गोत्रीय श्रेष्ठि धर्मसी की धर्मपत्नी धारलदेवी की रत्नकुक्षि से सम्वत 1647 वैशाख सुदि 7 के दिन हुआ। आपका जन्म नाम खेतसी कुमार था। बाल्यकाल में ही आप समस्त कलाओं का अभ्यास कर निपुण बन गए।

एक बार खरतरगच्छाचार्य श्री जिनसिंहसूरि जी बीकानेर पधारे। उनके धर्मोपदेश से खेतसी कुमार वैराग्य-वासित हुए। और लगभग 9-10 वर्ष की अल्पायु में श्री जिनसिंहसूरि जी के कर-कमलों से दीक्षा ग्रहण की। नव दीक्षित मुनि का नाम राजसिंह रखा गया। दादा गुरुदेव जिनचन्द्रसूरि जी ने आपको बड़ी दीक्षा दी और राजसमुद्र नाम प्रसिद्द किया।  

राजसमुद्र जी की बुद्धि बडी कुशाग्र थी। श्री जिनसिंहसूरि जी के पास अध्ययन कर, अल्पकाल में ही 45 आगम आदि शास्त्र पढ़कर आप गीतार्थ हुए। न्यायशास्त्र के भी आप बड़े विद्वान् थे। अल्पावस्था में आपने आगरा में भट्टाचार्य के पास चिन्तामणि तर्क-शास्त्र का अध्ययन किया। युगप्रधान श्री जिनचन्द्रसूरि जी ने योग्यता जानकर आसाउलि में राजसमुद्र जी को वाचक पद से अलंकृत किया।

एक महत्वपूर्ण घटना आपके आचार्य पद प्राप्ति के पहले की है। सम्वत 1662 जेठ सुदि 11 के दिन जोधपुर के निकट घंघाणी (गंगाणी) गांव में 65 अति प्राचीन प्रतिमाएँ भूमिगृह से निकली। मुस्लिम आक्रांताओं के भय से उन प्राचीन प्रतिमाओं को पूर्व में भूमिगृह में रख दिया गया था। उनमें से दो जिन प्रतिमाओं का सम्राट सम्प्रति तथा सम्राट अशोक द्वारा बनवाई गई होने का उल्लेख महोपाध्याय समयसुंदर जी ने अपने घंघाणी तीर्थ स्तवन में किया है।

वे प्रतिमाएं मौर्य काल तक की पुरानी थी। इसलिए उनके लेखों की लिपि पढ़ पाना बहुत ही कठिन था। पट्टावलियों एवं शिलालेखो में लिखा है कि धरणेन्द्र देव या अम्बिका देवी की सहायता से पूज्यश्री ने उस प्राचीन लिपि के लेखों को पढ़कर सबको चकित कर दिया।

वाचक राजसमुद्र जी को बड़े-बड़े राजा, राणा आदि बहुमान देते थे। नवाब मुकरब खान ने बादशाह के समक्ष आपकी बड़ी प्रसंशा की थी। वाचकजी ने समसद्दी-सिकदार को प्रसन्न कर 24 चोरों को बंधन मुक्त कराया था।

जैसलमेर में रावल भीमसिंह के सन्मुख तपागच्छीय सोमविजय जी को शास्त्रार्थ में वाचकजी ने पराजित किया था। 

एक बार जब खरतरगच्छाधिपति श्री जिनसिंहसूरि जी मेड़ता पधारे, तब वहां उनका शरीर अस्वस्थ रहने लगा। सूरिजी के अन्त समय में वाचकजी ने उनकी बड़ी भक्ति की। सूरिजी के श्रेयार्थ गच्छ पहिरावणी करके, ज्ञानभंडार में 636000 पुस्तकें लिखाकर रखने और 500 उपवास करने का वचन दिया। 

सम्वत 1674 में सूरिजी के स्वर्गवास के पश्चात, मेड़ता में वाचक राजसमुद्र जी को आचार्य पद से अलंकृत कर गच्छनायक घोषित किया गया। पूर्णिमापक्षीय श्री हेमाचार्य ने सूरि-मंत्र प्रदान किया और आपका नाम श्री जिनराजसूरि प्रसिद्द किया। आपके साथ ही श्री जिनसागरसूरि को भी आचार्य पदारूढ़ किया गया। पट्ट महोत्सव मेड़ता के चोपड़ा गोत्रीय संघवी आसकरण ने किया।

मेड़ता में आपको अम्बिका देवी सिद्ध हुई थी। अम्बिका देवी हाजिर रहकर आपको सानिध्य करती थी। एक बार अम्बिका देवी ने प्रत्यक्ष होकर “आपको भट्टारक पद (आचार्य पद) आज से पांचवे वर्ष प्राप्त होगा” ऐसी भविष्यवाणी की थी। 

जयतिहुअण स्तोत्र के स्मरण से धरणेन्द्र देव ने आपको कहा था कि “आज से चौथे वर्ष फाल्गुन सुदि 7 को आप भट्टारक पद पाओगे”। 

कहा जाता है कि श्री जिनसिंहसूरि जी के स्वर्गवास की सूचना आपको तीन दिन पूर्व ज्ञात हो गई थी।

महारावल कल्याणदास ने आचार्य जिनराजसूरि जी को जैसलमेर पधारने की विनती की। और पूज्यश्री के स्वागत के लिए राजकुमार मनोहरदास को भेजा। सूरिजी ने जैसलमेर में चातुर्मास किया। आपके प्रभाव से वहां सुकाल हुआ। राजकुमार मनोहरदास प्रतिदिन आपको वन्दन करने आते थे।

सम्वत 1662 में पूज्यश्री ने भाणवड़ नगर में पार्श्वनाथ आदि 80 प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा की। आपके अतिशय से बिम्ब से अमृत झरने लगा और अमृतझरा पार्श्वनाथ नाम से प्रसिद्धि हुई। यह तीर्थ जामनगर जिले के भाणवड़ गांव में स्थित है। 

जैसलमेर निवासी श्रेष्ठी थाहरुसाह भणशाली ने प्राचीन तीर्थ लौद्रवा का पुनरुद्धार कराया। प्राचीन मंदिर के नींव पर ही नया जिनालय बनवाकर, सहस्रफणा पार्श्वनाथ प्रभु की कसौटी पत्थर की अद्वितीय कलापूर्ण प्रतिमा की प्रतिष्ठा सम्वत 1675 मार्गशीर्ष सुदि 13 के दिन श्री जिनराजसूरि जी के कर-कमलों से सम्पन्न करवायी।

शत्रुंजय महातीर्थ की नव टूंकों में से सबसे ऊँची, और विमलवसही के सिवाय बाकी सब टुंकों में सबसे प्राचीन खरतरवसही की टूंक है। वहां पर श्रेष्ठिवर्य सोमजी-शिवजी ने 58 लाख रुपयों का व्यय कर चौमुखजी मंदिर का निर्माण करवाया। सोमजी के देहांत के पश्चात उनके पुत्र, अहमदाबाद निवासी रूपजी ने चौमुखजी मंदिर की प्रतिष्ठा सम्वत 1676 वैशाख सुदि 13 के दिन श्री जिनराजसूरि जी के कर-कमलों से करवायी।

जैसलमेर निवासी थाहरुसाह ने सूरिजी की निश्रा में शत्रुंजय महातीर्थ का संघ निकाला। थाहरुसाह ने शत्रुंजय की खरतरवसही में आदिनाथ भगवान् से लेकर महावीर स्वामी तक 24 तीर्थंकरो के 1452 गणधरों की चरणपादुकाओं की प्रतिष्ठा सम्वत 1682 में श्री जिनराजसूरि जी के द्वारा करवायी। 

मेड़ता, बीकानेर, पाली, अहमदाबाद आदि नगरों में भी आपने अनेक प्रतिष्ठाएं कराई। बीकानेर के सुप्रसिद्ध आदीश्वरजी के मंदिर में आपके द्वारा सम्वत 1686 में प्रतिष्ठित श्री जिनचंद्रसूरि जी की मूर्ति विद्यमान है।

श्री जिनराजसूरि जी ने सिंध प्रदेश में विहार कर धर्म प्रभावना की। कुशल गुरुदेव के स्वर्गवास से पवित्र, तीर्थ-रूप देराउर की आपने संघ सहित यात्रा की। पूज्यश्री ने सिन्ध विहार के समय पंच नदी साधना कर पांच पीर साधे थे।

सम्वत 1686 में आगरा में आपने 8 ब्राह्मणों को वाद में परास्त किया। इसके पश्चात आगरा में बादशाह शाहजहां बड़े आदरपूर्वक श्री जिनराजसूरि जी से मिले। सूरिजी ने साधुओं के विहार पर जहां कहीं भी प्रतिबंध था उसे खुलवाकर शासनोन्नति की।

पूज्यश्री ने 6 मुनियों को उपाध्याय पद, 41 को वाचक पद एवं एक साध्वीजी को प्रवर्तनी पद से विभूषित किया। आपने अनेक शिष्यों को आगमादि ग्रन्थ सिखाए। आपके 41 शिष्य और प्रशिष्यों में से कई बड़े विद्वान् और कवि थे।

जिनराजसूरि जी ने अपने स्वर्गवास के दो दिन पूर्व, उपाध्याय रत्नसोम को अपने पट्ट पर स्थापित कर स्वयं सूरि-मंत्र देकर श्री जिनरत्नसूरि नाम प्रसिद्द किया। सम्वत 1700 आषाढ़ सुदि 9 के दिन पाटण में आपका स्वर्गवास हुआ। आपके समय में राजस्थान और गुजरात में खरतरगच्छ का बहुत प्रभाव था।

श्री जिनराजसूरि जी बड़े ही प्रभावशाली एवं विद्वान आचार्य थे। आप न्याय शास्त्र के विशिष्ट विद्वान् एवं साहित्य शास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। आपने अनेक मौलिक ग्रंथों का सर्जन किया। भगवती सूत्र, ठाणांग सूत्र आदि अनेक आगमादि ग्रंथों के विवरण लिखे। आपकी सबसे बड़ी रचना नैषध महाकाव्य पर 36000 श्लोक परिमित जैनराजी वृत्ति है। 

आपके द्वारा रचित 24 तीर्थंकर के स्तवन (चौवीसी) एवं महाविदेह क्षेत्र के विहरमान तीर्थंकरों के स्तवन (वीसी) भक्ति रस से भरपूर है। आपकी कृति शालिभद्र रास इतनी लोकप्रिय हुई कि बादशाही चित्रकार शालिवाहन ने इसकी एक सचित्र प्रति चित्रित की। जैन रामायण का आपने राजस्थानी काव्य के रूप में निर्माण किया। कयवन्ना रास, गजसुकमाल रास आदि आपकी संस्कृत, हिंदी, राजस्थानी की सैकड़ों रचनाएं उपलब्ध हैं।

मस्त योगी ज्ञानसार जी ने लिखा है – “गुजरात माँ ए कहिवत छे आनंदघन टंकसाली, जिनराजसूरि बाबा तो अवध्य बचनी” अर्थात् इनके वचनों के प्रति लोगों को बहुत ही आदर भाव था।

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