सप्रभाव स्तोत्र

युगप्रधान श्री जिनदत्तसूरि कृत सप्रभाव स्तोत्र मम हरउं जरं मम हरउ विझरं डमरं डामरं हरउ  । चोरारि-मारि-वाही हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। १ ।। एगंतरं निच्चजरं वेल जरं तह य सीय-उण्ह-जरं  । तईअ-जरं चउत्थ-जरं हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। २ ।। जिणदत्ताणापालणपरस्स संघस्स विहि-समग्गस्स  । आरोग्गं सोहग्गं अपवग्गं कुणउ पास-जिणो  ।। ३ ।। अनुवाद हे पार्श्व तीर्थंकर … Read more

आचार्य जिनपतिसूरि

दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि के पट्टधर श्री जिनपतिसूरि हुए। आपका जन्म विक्रमपुर में मालू गोत्रीय यशोवर्धन की धर्मपत्नी सुहवदेवी की रत्नकुक्षि से सम्वत 1210 में हुआ। आपकी दीक्षा दादा जिनचंद्रसूरि के कर कमलों से सम्वत 1217 में हुई। आपका दीक्षा नाम नरपति था। सम्वत 1223 में बड़े महोत्सव के साथ जयदेवसूरि ने आपको आचार्य पद … Read more

गुरु इकतीसा

* दोहा * श्री गुरुदेव दयाल को, मन में ध्यान लगाय । अष्ट सिद्धि नव निधि मिले, मन वांछित फल पाय ।। * चौपाई * श्री गुरु चरण शरण में आयो, देख दर्श मन अति सुख पायो । दत्त नाम दुख भंजन हारा, बिजली पात्र तले धरनारा ।।१।। उपशम रस का कन्द कहावे, जो सुमरे … Read more

दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि

दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि जी के पट्टधर, सूर्य के समान तेजस्वी आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि, मणिधारी दादा गुरुदेव के नाम से जाने जाते हैं। असाधारण व्यक्तित्व एवं लोकोत्तर प्रभाव के कारण अल्प आयु में जो प्रसिद्धि आपने प्राप्त की वह परमात्मा महावीर के शासन के स्वर्णिम इतिहास का एक अनूठा अध्याय है। एक बार श्री जिनदत्तसूरि … Read more

दादा गुरुदेव जिनदत्तसूरि

भगवान महावीर की धर्म-परंपरा को जीवित एवं विशुद्ध बनाये रखने के लिए समय समय पर अनेक अमृत-पुरुष हुए। उनमें आचार्य जिनदत्तसूरि जैसे नवयुग प्रवर्त्तक महापुरुष की गणना होती है। श्री जिनदत्तसूरि जैन धर्म और उसकी खरतरगच्छीय परंपरा के एक ऐसे सुदृढ़ स्तम्भ थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, साधना और प्रकांड पांडित्य के बल पर समाज में … Read more

आचार्य जिनवल्लभसूरि

आचार्य अभयदेवसूरि के पट्ट पर जिनवल्लभसूरि हुए। वे मूलतः आशिका नगरी (हांसी) के निवासी थे। उनके पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे। अतः माता ने ही उनका पालन पोषण किया था। जब उनकी आयु पढ़ने योग्य हुई तब माता ने उन्हें कूर्चपुरगच्छीय चैत्यवासी जिनेश्वराचार्य के मठ में शिक्षा के लिए भेजा। आप बहुत … Read more

नवांगी टीकाकार आचार्य अभयदेवसूरि

संवेग रंगशाला के रचयिता श्री जिनचन्द्रसूरि के पट्टधर नवांगी टीकाकार श्री अभयदेवसूरि हुए। आपका जीवन वृतांत हमें “प्रभावक चरित्र” नामक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। आपके पिता का नाम श्रेष्ठी महीधर तथा माता का नाम धनदेवी था। मालवा प्रदेश की राजधानी धारा नगरी में संवत 1071 में आपका जन्म हुआ। संवत 1080 में आचार्य जिनेश्वरसूरि … Read more

संवेग रंगशाला के रचयिता आचार्य जिनचंद्रसूरि

आचार्य जिनेश्वरसूरि के पट्ट पर सूरियों में श्रेष्ठ श्री जिनचंद्रसूरि हुए। वे नवांगी टीकाकार अभयदेवसूरि के वरिष्ठ गुरुभ्राता थे। खरतरगच्छ की परंपरा में जिनचंद्रसूरि के नाम से अनेक प्रभावशाली आचार्य हुए। उनमें से प्रथम नाम “संवेग रंगशाला” के रचनाकार आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि का है। संवत 1125 में आचार्य अभयदेवसूरि के निवेदन पर सूरिजी ने अठारह … Read more

आचार्य बुद्धिसागरसूरि

आचार्य बुद्धिसागरसूरि मध्य देश के निवासी थे। उनके पिताजी का नाम कृष्ण था। इनका बचपन का नाम श्रीपति था और वे जिनेश्वरसूरि के भाई थे। दोनों ही भाई बड़े प्रतिभावान थे। उन्होंने छोटी उम्र में ही ब्राह्मणीय परंपरा के अनेक धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया। एक बार दोनों भाई देशाटन हेतु घूमते घूमते धारा नगरी … Read more