दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि के पट्टधर श्री जिनपतिसूरि हुए। आपका जन्म विक्रमपुर में मालू गोत्रीय यशोवर्धन की धर्मपत्नी सुहवदेवी की रत्नकुक्षि से सम्वत 1210 में हुआ। आपकी दीक्षा दादा जिनचंद्रसूरि के कर कमलों से सम्वत 1217 में हुई। आपका दीक्षा नाम नरपति था। सम्वत 1223 में बड़े महोत्सव के साथ जयदेवसूरि ने आपको आचार्य पद प्रदान कर जिनचंद्रसूरि के पट्टधर गणनायक घोषित किया तथा आपका जिनपतिसूरि नव नामकरण हुआ। मात्र 13 वर्ष की अल्प आयु में आचार्य जैसी सर्वोच्च उपाधि और विशाल खरतरगच्छ का संचालन का भार प्राप्त हो जाना एक विशिष्ट बात है।

जिनपतिसूरि ने अपने जीवल काल में 36 बार शास्त्रार्थ में विजय-पताका प्राप्त की। इसलिए आपका विरुद “षट्त्रिंशत वाद-विजेता” प्रचलित हुआ। सम्वत 1228 में आचार्यश्री आशिका नगरी पधारे। नगर प्रवेश में स्वयं राजा भीमसिंह भी सम्मिलित हुए। वहां पर दिगंबर आचार्य महाप्रामाणिक के साथ आपका शास्त्रार्थ हुआ जिसमें आप विजयी हुए। जिनपतिसूरि का यह प्रथम वाद-विजय था।

सम्वत 1239 में अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की राजसभा में जिनपतिसूरि का शास्त्रार्थ फलवर्द्धिका नगरी के उपकेशगच्छीय पद्मप्रभाचार्य के साथ हुआ। आचार्यश्री के सर्व-शास्त्रों में पांडित्य के प्रभाव से पद्मप्रभाचार्य पराजित हुए। जिनपतिसूरि की असाधारण प्रतिभा को देखकर पृथ्वीराज चौहान प्रसन्न हुआ और विजय-पत्र को हाथी के हौदे में रखकर स्वयं पौषधशाला में जाकर पूज्यश्री के हाथों में पत्र को अर्पित किया।

सम्वत 1244 में उज्जयन्त-शत्रुंजय आदि तीर्थों की यात्रार्थ संघ सहित प्रयाण करते हुए आचार्यश्री चंद्रावती नगरी पधारे। पूर्णिमागच्छीय आचार्य अकलंकदेवसूरीजी से “जिनपति नाम” एवं “संघ के साथ साधु-साध्वियों का गमनागमन शास्त्रोक्त है या नहीं” इन प्रश्नों पर शास्त्र-चर्चा हुई। जिनपतिसूरि ने प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि “जिन है पति जिसका वह है जिनपति”। द्वितीय प्रश्न का उत्तर देकर आचार्यश्री ने यह सिद्ध किया कि “यदि संघ किसी तीर्थ की यात्रा करने के लिए जाता हो और वह साधु-साध्वियों को तीर्थाटन करने के लिए निवेदन करे तो साधु-साध्वी का संघ के साथ जाना शास्त्र-सम्मत है”। उत्तर सुनकर अकलंकदेवसूरीजी, जिनपतिसूरि की अप्रतिम विद्वता से अत्यधिक प्रभावित हुए।

कासहृद में तिलकप्रभसूरि के साथ “संघपति” तथा “वाक्यशुद्धि”, इन विषयों पर शास्त्रीय चर्चा हुई जिसमें जिनपतिसूरि विजयी हुए। इसके पश्चात आशापल्ली में आचार्य प्रद्युम्न के साथ “आयतन – अनायतन” सम्बंधित शास्त्रार्थ में जिनपतिसूरि ने विजय प्राप्त की। और यह सिद्ध कर दिया कि जिस जिन मंदिर में साधू निवास करते हैं और उसकी संभाल करते हैं वह अनायतन है। जिनपतिसूरि की आज्ञा लेकर जिनपालोपाध्याय ने काश्मीरी पंडित मनोदानन्द को शास्त्रार्थ में हराया।

वृद्धाचार्य प्रबन्धावली में जिनपतिसूरि के बारे में एक अलौकिक प्रसंग लिखा है। आसी-नगर में प्रतिष्ठा महोत्सव के समय एक विद्यासिद्ध योगी ने भिक्षा न मिलने के कारण क्रोधित होकर मूलनायक के बिम्ब को मन्त्रों से कीलित कर दिया। इस कारण से प्रतिष्ठा के समय संघ प्रतिमा को उठा न पाया। तब चिंतातुर संघ के निवेदन करने पर जिनपतिसूरि ने प्रतिमा पर अभिमंत्रित चन्दन-चूर्ण डाला। जिसके बाद वह प्रतिमा मात्र एक ही व्यक्ति ने उठा ली।

आचार्यश्री ने धारानगरी में शांतिनाथ भगवान के मंदिर में विधि मार्ग को प्रचलित किया। सम्वत 1271 में वागड़ देश के बृहद्वार नगर के श्रावकों में मिथ्यादृष्टि गोत्र-देवियों की पूजा आदि मिथ्या-क्रिया को बंद करवाया। “नाहटा ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह” पुस्तक के अनुसार जिनपतिसूरि को जालंधरा देवी प्रत्यक्ष थी।

सागरपाड़ा में अजितनाथ स्वामी एवं शान्तिनाथ स्वामी के मंदिरों की प्रतिष्ठा, जाबालीपुर में महामंत्री कुलधर द्वारा कारित महावीर स्वामी की प्रतिमा की स्थापना, आशिका नगरी के पार्श्वनाथ स्वामी के मंदिर के शिखर पर स्वर्ण ध्वज कलश आरोपण, पत्तन में महावीर स्वामी की प्रतिमा की स्थापना, जैसलमेर के मंदिर में पार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा की स्थापना आदि अनेक प्रतिष्ठाएं जिनपतिसूरि ने की। विक्रमपुर में भांडागारिक गुणचन्द्र गणि स्तूप की प्रतिष्ठा और अजमेर में दादा जिनदत्तसूरि के स्तूप का जीर्णोद्धार कराकर विशाल रूप देने का कार्य भी आपने किया।

जिनपतिसूरि का शिष्य समुदाय विस्तृत था। आपके शताधिक शिष्य थे। मरुकोट्ट निवासी भंडारी नेमिचन्द्र ने 12 वर्ष तक आपके साथ विचरण कर आपके विशुद्ध आचरण से प्रभावित होकर दीक्षा ग्रहण की। अणहिलपुर पाटण में अपने गच्छ के 40 आचार्यों को अपने मंडल में मिलाकर उनका सम्मान किया।

आपके जीवनकाल में अनेकों दीक्षाएँ, पदारोहण, उपधान आदि हुए। जिनपतिसूरि ने साधु पद्मप्रभ को आचार्य पद, जिनमत गणि और जिनहित मुनि को उपाध्याय पद, सागरपाट में पंडित मणिभद्र के पट्ट पर विनयभद्र को वाचनाचार्य पद, पूर्णदेव गणि, मानचन्द्र गणि, गुणभद्र गणि, जिनपाल गणि, गुणशील मुनि, जिनरथ मुनि को वाचनाचार्य पद, नागद्रह ग्राम में आर्या आनंदश्री को महत्तरा पद प्रदान किये।

जिनपतिसूरि के समय उत्तर भारत पर मुस्लिम आक्रमणकारियों का राज स्थापित होने लगा था। सम्वत 1251 के आसपास मुसलमानों के उपद्रव के कारण आचार्यश्री ने अजमेर में दो मास बड़े कष्ट से बिताये। सम्वत 1253 में मुसलमानों द्वारा पाटण नगर का विध्वंस होने पर जिनपतिसूरि ने घाटी ग्राम में चातुर्मास किया।

कासहृद में शास्त्रीय चर्चा के समय, “एवकार युक्त निश्चयात्मक वचन” इस विषय में जिनपतिसूरि के उत्तर सुनकर गुणग्राही तिलकप्रभसूरि ने अत्यंत हर्षित मन से कहा कि “आप समस्त गुजरात में सिंह की तरह निडर होकर विचरें। आपके सम्मुख विरोधी रूप से कोई नहीं ठहर सकेगा।” इस शुभ वचन को सुनकर आचार्यश्री के पास में बैठे हुए एक मुनि ने अपने कपड़े की खूँट में शकुन ग्रंथी बाँधी। अपने या अपनों के सम्बन्ध में कोई शुभ संवाद सुनकर कपड़े में गाँठ बांधने की प्रथा आज भी मारवाड़ में प्रचलित है।

जिनपतिसूरि न केवल शास्त्र विजेता ही थे बल्कि आगम साहित्य के धुरंधर विद्वान् थे। आपकी अनेक रचनाएँ प्राप्त है। उनमें से पंचलिंगी प्रकरण टीका, संघपट्टक बृहद वृति, खरतरगच्छ समाचारी आदि आपकी अत्यंत महत्वपूर्ण रचनाएँ है।

67 वर्ष की आयु में आपको पालनपुर में व्याधि का प्रकोप हुआ। 13वीं सदी के महान वादजयी जिनपतिसूरि का स्वर्गारोहण सम्वत 1277 में हुआ।  


क्रमांक 9 – आचार्य जिनपतिसूरि

संकलन – सरला बोथरा

आधार – स्व. महोपाध्याय विनयसागरजी रचित खरतरगच्छ का बृहद इतिहास