युगप्रधान श्री जिनदत्तसूरि कृत सप्रभाव स्तोत्र

मम हरउं जरं मम हरउ विझरं डमरं डामरं हरउ  ।

चोरारि-मारि-वाही हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। १ ।।

एगंतरं निच्चजरं वेल जरं तह य सीय-उण्ह-जरं  ।

तईअ-जरं चउत्थ-जरं हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। २ ।।

जिणदत्ताणापालणपरस्स संघस्स विहि-समग्गस्स  ।

आरोग्गं सोहग्गं अपवग्गं कुणउ पास-जिणो  ।। ३ ।।

अनुवाद

हे पार्श्व तीर्थंकर मेरे जरा, ज्वर, डमर (क्लेश), डामर (आफत), चोर-शत्रु मारी, व्याधि सभी का हरण करो ।

एकान्तर ज्वर, शीत ज्वर, उष्ण ज्वर, नित्य ज्वर, तीसरे दिन का ज्वर, चतुर्थ दिन का ज्वर सभी ज्वरों का हरण करो ।

जिनदत्त आज्ञा का पालन करने में तत्पर, विधि के मार्ग में रहे हुए संघ को हे पार्श्व जिनेश्वर आरोग्य सौभाग्य एवं अपवर्ग दो ।


इस स्तोत्र में दादा जिनदत्तसूरिजी ने पार्श्वनाथ भगवान से आधी, व्याधि, उपाधि का शमन करके, श्रीसंघ को आरोग्य, सौभाग्य व अपवर्ग अर्थात मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना की है।

साभार
प. पू. शतावधानी मनोहरश्रीजी म. सा. की शिष्या डॉ स्मितप्रज्ञा श्रीजी म. सा. द्वारा रचित ग्रन्थ “युगप्रधान आचार्य श्री जिनदत्तसूरि का जैन धर्म एवं साहित्य में योगदान”