सप्रभाव स्तोत्र

युगप्रधान श्री जिनदत्तसूरि कृत सप्रभाव स्तोत्र मम हरउं जरं मम हरउ विझरं डमरं डामरं हरउ  । चोरारि-मारि-वाही हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। १ ।। एगंतरं निच्चजरं वेल जरं तह य सीय-उण्ह-जरं  । तईअ-जरं चउत्थ-जरं हरउ ममं पास-तित्थयरो  ।। २ ।। जिणदत्ताणापालणपरस्स संघस्स विहि-समग्गस्स  । आरोग्गं सोहग्गं अपवग्गं कुणउ पास-जिणो  ।। ३ ।। अनुवाद हे पार्श्व तीर्थंकर … Read more

दादा गुरुदेव जिनदत्तसूरि

भगवान महावीर की धर्म-परंपरा को जीवित एवं विशुद्ध बनाये रखने के लिए समय समय पर अनेक अमृत-पुरुष हुए। उनमें आचार्य जिनदत्तसूरि जैसे नवयुग प्रवर्त्तक महापुरुष की गणना होती है। श्री जिनदत्तसूरि जैन धर्म और उसकी खरतरगच्छीय परंपरा के एक ऐसे सुदृढ़ स्तम्भ थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, साधना और प्रकांड पांडित्य के बल पर समाज में … Read more

दादा श्री जिनदत्तसूरि काव्यम्

दासानुदासा इव सर्वदेवा यदीय पदाब्जतले लुठंति मरुस्थलीकल्पतरुः स जीयात् युगप्रधानो जिनदत्तसूरिः  ।।१।। चिंतामणिः कल्पतरूर्वराकौ कुर्वन्ति भव्याः किमु कामगव्या प्रसीदतः श्रीजिनदत्त सूरे सर्वे पदा हस्तिपदे प्रविष्टाः  ।।२।। नो योगी न च योगिनी न च नराधीशश्च नो शाकिनी नो वेताल-पिशाच राक्षसगणा नो रोगशोकौ भयं नो मारी न च विग्रहप्रभृतयः प्रीत्या प्रणत्युच्चकैः यस्ते श्री जिनदत्तसूरिः गुरवे नामाक्षरं ध्यायति  … Read more