महान वादजयी जिनपतिसूरि के शिष्य समुदाय में उपाध्याय जिनपाल प्रमुख थे। आपकी दीक्षा सम्वत 1225 में पुष्कर नगर में हुई। सम्वत 1269 में जालौर के विधिचैत्य में जिनपतिसूरि ने आपको उपाध्याय पद प्रदान किया।

सम्वत 1273 में राजा पृथ्वीचन्द्र की राजसभा में जिनपतिसूरि की आज्ञा से उपाध्याय जिनपाल ने काश्मीरी पंडित मनोदानन्द के साथ शास्त्रार्थ किया। शास्त्रार्थ का विषय था “जैन दर्शन षड्दर्शन से बाह्य है या नहीं”। पंडित मनोदानन्द को पराजित कर राजा पृथ्वीचन्द्र से आपने विजयपत्र प्राप्त किया।

उपाध्याय जिनपाल खरतरगच्छ के एक महान विद्वान् थे। न्याय, अलंकार, काव्य आदि का आपको गहन ज्ञान था। चित्र-काव्य में आपकी विशेष रूचि थी।  आपने “सनत्कुमार चरित” जैसा उत्कृष्ट कोटि का महाकाव्य रचकर साहित्य जगत में महाकवि के रूप में कीर्ति प्राप्त की।

आपके द्वारा रचित 4000 श्लोक-प्रमाण “खरतरगच्छ बृहद् गुर्वावली” एक विशेष महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें 11वीं सदी से 14वीं सदी तक में हुए खरतरगच्छ परंपरा के आचार्यों के चरित्र का विस्तृत वर्णन है। डॉ गुलाबचंद चौधरी के शब्दों में गुरु परंपरा का इतना विस्तृत और विश्वस्त चरित वर्णन करनेवाला ऐसा कोई और ग्रन्थ अभी तक ज्ञात नहीं हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह ग्रन्थ अपने ढंग की एक अनोखी कृति है।

उपाध्याय जिनपाल ने साहित्य-संसार को और भी अनेक ग्रन्थ-रत्न प्रदान किये। उनमें से कुछ रचनाएँ निम्नलिखित है –

  • जिनपतिसूरि पंचाशिका
  • उपदेशरसायन विवरण
  • चर्चरी विवरण
  • स्वप्नफल विवरण
  • संक्षिप्त पौषधविधि प्रकरण

आपने अनेक मुनियों को प्रशिक्षित किया। “अभयकुमार चरित” महाकाव्य के रचयिता गणि चन्द्रतिलक को आपने ही अध्ययन करवाया था।

उपाध्याय जिनपाल का स्वर्गवास सम्वत 1311 में हुआ।


क्रमांक 10 – उपाध्याय जिनपाल 

संकलन – सरला बोथरा

आधार – प. पू. मुनि श्री चंद्रप्रभसागरजी म. सा. रचित खरतरगच्छ का आदिकालीन इतिहास