आचार्य अभयदेवसूरि के पट्ट पर जिनवल्लभसूरि हुए। वे मूलतः आशिका नगरी (हांसी) के निवासी थे। उनके पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे। अतः माता ने ही उनका पालन पोषण किया था। जब उनकी आयु पढ़ने योग्य हुई तब माता ने उन्हें कूर्चपुरगच्छीय चैत्यवासी जिनेश्वराचार्य के मठ में शिक्षा के लिए भेजा। आप बहुत ही मेधावी छात्र थे।

एक बार मठ से घर जाते हुए रास्ते में उन्हें एक टीपना मिला, जिस में सर्पाकर्षणी तथा सर्पमोक्षणी नामक दो विद्याएं लिखी हुई थी। उन्होंने सर्पाकर्षणी विद्या के मंत्रों का उच्चारण किया तो सांप ही सांप आ गए। परन्तु वे गभराये नहीं और दूसरी सर्पमोक्षणी विद्या का विधि सहित उच्चारण कर के उन आते हुए सर्पों को वापस लौटा दिया। यह बात जब जिनेश्वराचार्य को पता चली तो बालक को गुणी जानकार अपने पास दीक्षित किया।

किसी समय जिनेश्वराचार्य को कार्यवश गाँव के बाहर जाना पड़ा। तब मठ के संचालन का भार जिनवल्लभ ने संभाला। उन्होंने विचार किया कि पुस्तकों से ही सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह सोचकर भंडार में रखी हुई सिद्धांत कि एक पुस्तक निकाली। उसमें लिखा हुआ था – “साधुओं को गृहस्थों के घरों से 42 दोषों से रहित भिक्षा ‘मधुकरी वृत्ति’ से लेकर संयम पालने के लिए देह निर्वाह करना चाहिए। यह सब पढ़कर उन्होंने विचार किया कि संयम और आचार ही मुक्ति का मार्ग है।

जिनेश्वराचार्य ने जिनवल्लभ को व्याकरणादि समस्त साहित्य का अध्ययन करवाकर सैद्धांतिक जैन आगम ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आचार्य अभयदेवसूरि के पास भेजा। अभयदेवसूरि ने सोचा कि हालाँकि जिनवल्लभ एक चैत्यवासी गुरु के शिष्य हैं पर इनके सामुद्रिक लक्षण देखते हुए यह ज्ञात होता है कि निश्चय ही यह कोई भव्य जीव है। तथा जिनवल्लभ की असाधारण प्रतिभा और योग्यता देखकर सहर्ष आगमों की वाचना दी।

जिनवल्लभ गणी ने सैद्धांतिक जैन आगम ग्रंथों का ज्ञान अभयदेवसूरि से थोड़े ही समय में प्राप्त कर लिया। आचार्य अभयदेवसूरि के एक विद्वान् ज्योतिष भक्त ने जिनवल्लभ को ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करवा कर उस विषय में भी निष्णात बना दिया। यथा विधि विद्याध्ययन पूर्ण करने के बाद जिनवल्लभ गणी ने अपने दीक्षा गुरु जिनेश्वराचार्य के पास आशिका नगरी जाने की इच्छा प्रकट की।

अभयदेवसूरि ने जाने की आज्ञा देते हुए आदेश दिया – “मैंने सारे सिद्धांत अपने जानकारी के अनुसार तुम्हें पढ़ा दिये हैं। तुमको अपने जीवन में सिद्धांत की अनुसार ही आचरण करना चाहिए। हे वत्स! शास्त्र की प्रतिकूल किसी भी प्रकार का व्यवहार मत करना।” जिनवल्लभ गणी ने कहा – “भगवन! श्रीमान की आज्ञा की अनुसार ही सदा बर्ताव करूँगा।”

विद्या गुरु की आज्ञा लेकर वहां से विहार कर आप मरुकोट पहुंचे। वहां पर आपने सिद्धांतों के अनुकूल एक विधि लिखी, जिस के पालन से अविधि चैत्य (मंदिर) भी मुक्ति साधक विधि-चैत्य बन सकता है। वह विधि इस प्रकार है।

  • विधि चैत्य (मंदिर) में उत्सूत्र भाषी मनुष्यों का आनाजाना व बर्ताव नहीं होगा
  • रात्रि में स्नात्र महोत्सव नहीं होना चाहिए
  • साधुओं का ममता भाव अधिकार मंदिर में नहीं रहना चाहिए
  • रात्रि के समय स्त्रियों का आनाजाना मंदिर में नहीं होगा
  • ज्ञाति जाती का दुराग्रह नहीं होगा – यानी किसी जाती ज्ञाति का आधिपत्य मंदिर पर नहीं रहेगा
  • श्रावक लोग परस्पर ताम्बूल का लेना-देना व भक्षण करना मंदिर में नहीं कर सकेंगे

इस प्रकार की यह शास्त्र-विहित आज्ञायें किसी की निश्रा-रहित और विधिपूर्वक स्थापित इस जिन मंदिर में प्रवर्तित रहेगी। अभिप्राय यह था कि इस विधि का पालन करना चाहिए जिससे धर्म क्रिया मुक्ति का साधन बने।

तदनन्तर जिनवल्लभ गणी अपने दीक्षा गुरु जिनेश्वराचार्य के पास जाते हुए आशिका नगरी से तीन कोस दूर माइयड नामक ग्राम में पहुंचे। और वहां पर जिनेश्वराचार्य से चैत्यवास त्याग की आज्ञा प्राप्त की। फिर पाटण आकर वसति मार्ग अपनाया और अभयदेवसूरि से उपसम्पदा ग्रहण की।

जिनवल्लभ गणी क्रन्तिकारी विचारक होने के कारण चैत्यवास परंपरा की कटु आलोचना करते थे। कुछ दिन गुर्जर देश में रहने के पश्चात वे चित्तौड़ (चित्रकूट) पधारे। चित्तौड़ भी चैत्यवासियों का प्रबल गढ़ था और इस कारण इन्हें वहां ठहरने का स्थान नहीं मिला। अंततः वे चामुंडा मंदिर में ठहरे। चण्डिका देवी भी उनके ज्ञान ध्यान और चारित्रिक शुद्धता को देखकर उनकी सिद्धिदात्री बन गयी।

उनकी विद्वता और शुद्ध आचार की कीर्ति सर्वत्र फ़ैल गयी। जैन श्रावकगण चैत्यवास परंपरा का त्याग कर उनके अनुयायी बनने लगे। चित्तौड़ में विधि-चैत्य नहीं होने के कारण आपने पार्श्वनाथ भगवान और महावीर स्वामी के मंदिरों की प्रतिष्ठा करवाई। इन दोनों मंदिरों के अवशेष भी आज प्राप्त नहीं है। किन्तु ‘वीर चैत्य प्रशस्ति’ और ‘पार्श्व चैत्य प्रशस्ति’ आज भी प्राप्त है जिनमें आपका उल्लेख है।

आपने नागौर (नागपुर) में नेमिनाथ मंदिर तथा नरवर, मरुकोट्ट आदि स्थानों में विधि चैत्यों की प्रतिष्ठा करवाई। चैत्यवास के प्रभाव से जैन मंदिरों में जो अविधि प्रवर्तन हो गया था उसका निषेध करते हुए विधि चैत्यों के नियम सम्बंधित शिलापट्ट भी लगवाए।

एक समय अभयदेवसूरि ने अपने शिष्य आचार्य प्रसन्नचंद्र से कहा कि “मेरे पाट पर अच्छा लगन देखकर जिनवल्लभ गणी को स्थापित करना”। परन्तु दैव योग से प्रसन्नचंद्रसूरि को इस कार्य को पूर्ण करने का सुअवसर नहीं मिला और उनका देवलोक गमन हो गया। स्वर्गवास से पूर्व कपडवंज में आपने इस उत्तरदायित्व को आचार्य देवभद्रजी को सौंप दिया। प्रसन्नचंद्रसूरि की आज्ञा का पालन करते हुए देवभद्रसूरि ने सम्वत 1167 मिती आषाढ़ शुक्ला 6 को चित्तौड़ के महावीर प्रभु विधि-चैत्य में जिनवल्लभ गणी को आचार्य पद प्रदान कर अभयदेवसूरि के पट्ट पर स्थापित किया।

आचार्य पदवी के 4 माह के भीतर ही सम्वत 1167 मिती कार्तिक कृष्णा 12 रात्रि के चतुर्थ पहर में जिनवल्लभसूरि तीन दिन का अनशन कर पंच परमेष्ठी का ध्यान करते हुए चतुर्विध संघ को मिथ्या दुष्कृत दान देकर चौथे देवलोक में देव रूप में उत्पन्न हुए।

जिनवल्लभसूरि की प्रकांड विद्वता और साहित्य सर्जना

आचार्य जिनवल्लभसूरि सभी विद्याओं में पारदर्शी विद्वान् थे। बाद के विद्वानों ने आपको कालिदास के जैसा कवि बतलाया है। आपने संस्कृत, प्राकृत  और अपभ्रंश भाषाओँ में सैकड़ों ग्रंथों की रचना की। भारतीय साहित्य में यह असाधारण घटना है कि किसी लेखक की रचना पर उनके स्वर्गवास के 1-2 पश्चात से ही टीकाएँ रची गयी हों। तपागच्छीय, राजगच्छीय, चंद्रगच्छीय आदि अन्य गच्छों के धुरंधर और प्रौढ़ विद्वानों ने इनकी विविध कृतियों पर टीका रचकर इनको प्रामाणिक विद्वान् माना है।

जिनवल्लभ गणी ने सम्वत 1125 के आस पास आचार्य जिनचन्द्रसूरि द्वारा रचित संवेगरंगशाला का संशोधन भी किया। श्रृंगार शतक भी आपकी अद्भुत रचना है। आचार्य अभयदेवसूरि से उपसम्पदा ग्रहण के पूर्व चैत्यवास में रहते हुए इसकी रचना की। वीरचैत्यप्रशस्ति आपकी एक अपूर्व रचना है। यह सम्वत 1163 में चित्तौड़ के महावीर चैत्य की प्रतिष्ठा के समय रची गयी थी। यह प्रशस्ति वस्तुतः जिनवल्लभ गणी की संक्षिप्त आत्म-कथा है। इसकी एक मात्र प्रतिलिपि L. D. Institute of Indology, Ahmedabad में सुरक्षित है।

जिनवल्लभसूरि के द्वारा रचित कुछ ग्रन्थ

  • सार्द्धशतक प्रकरण
  • षडशीति प्रकरण
  • पिंडविशुद्धि प्रकरण
  • पौषधविधि प्रकरण
  • श्रावकव्रत कुलक
  • प्रतिक्रमण समाचारी
  • स्वप्न सप्तति
  • द्वादशकुलकानि
  • सर्वजीवशरीरावगाहना

षट कल्याणक

प्रत्येक तीर्थंकर के पांच कल्याणक होते हैं – च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान, निर्वाण। महावीर स्वामी का एक और कल्याणक होता है जिसका नाम है गर्भापहार। 24 तीर्थंकरों में केवल महावीर स्वामी ही ऐसे हैं जिनका जीव पहले ब्राह्मणी देवानंदा के गर्भ में आता है और वहां से 82 दिन बाद उनका स्थानांतरण त्रिशला माता के गर्भ में होता है। देवानंदा के गर्भ में जब महावीर स्वामी का जीव आता है तब वे 14 स्वप्न देखती है। वही जीव जब त्रिशला माता के गर्भ में स्थानांतरित हो जाता है तब त्रिशला माता भी 14 स्वप्न देखती है। इस प्रकार गर्भापहरण को मिलाकर कुल 6 कल्याणक महावीर स्वामी के होते हैं। प्राचीन ग्रंथकारों – शीलांक, तपागच्छीय कुलमण्डनसूरि, अंचलगच्छीय माणिकऋषि, उपकेशगच्छीय गणपति, आगमिकगच्छीय जयतिलकसूरि आदि ने अपनी कृतियों में महावीर स्वामी के गर्भापहार को भी कल्याणक मानकर उनके 6 कल्याणक स्वीकार किये हैं ।

चित्तौड़ में जिनवल्लभगणी ने आसो मास की कृष्ण पक्ष की 13 को श्रावकों से कहा कि आज भगवान् महावीर स्वामी का छठा कल्याणक है। उन्होंने बताया कि “पंच हत्थुत्तरे होत्था साइणा परिनिव्वूए” इस सिद्धांत-वाक्य से इस कल्याणक को होना स्पष्ट सिद्ध है। यह सुनकर सभी ने समारोह पूर्वक गर्भापहार कल्याणक उत्सव मनाया।

जिनवल्लभसूरि के जीवन के रोचक प्रसंग

उस समय की प्रजा ही नहीं राजा भी आप से बहुत प्रभावित थे। एक समय धारा नगरी के राजा नरवर्म की राज्य सभा में दक्षिण से आये दो पंडितों ने एक समस्या रखी – “कण्ठे कुठारः कमठे ठकारः”। राज्य सभा के विद्वानों द्वारा समस्या-पूर्ति करने पर भी न तो प्रस्तुत-करता पंडित ही संतुष्ट हो पाये और न ही धारा नरेश। जिनवल्लभ गणि की कीर्ति सुनकर राजा ने इस समस्या की पूर्ति करने के लिए गणि जी के पास अपने सेवकों को भेजा।

जिनवल्लभ गणि ने इसकी पूर्ति इस प्रकार की – “रे रे राजाओं! जिसने अपने घोड़ों के तीक्ष्ण खुराग्र घात से भूतल के नीचे रहे हुए कच्छप पर ठपकार किया है, उस नरवर्म राजा को प्रसन्न करने के वास्ते तुम नत मस्तक होकर अपने कंठ के पास कुहाड़ा धारण करो।”

इस समस्या पूर्ति से प्रसन्न हो कर धारा नरेश भी जिनवल्लभ गणि के परम भक्त बन गए। और उन्होने गणि जी के उपदेश से चित्तौड़ के दो मंदिरों में दान दिया।

एक विद्वान् ज्योतिष घमंड करके गणि जी के पास आया। जिनवल्लभ गणि ने उससे प्रश्न किया कि यह बादली कितना पानी बरसायेगी। परन्तु वह इसका उत्तर नहीं दे पाया। तब गणि जी ने बताया कि इतनी वर्षा होगी कि यह सारे चौड़े पात्र भर जायेंगे। और वैसा ही हुआ।

एक दिन व्याख्यान देकर लौटते समय जिनवल्लभ गणि ने मार्ग में घोड़े पर सवार दूल्हे के पीछे मांगलिक गायन करती हुई महिलाओं को देखा। यह देखकर महाराजश्री ने कहा कि “देखो संसार की विचित्रता! यह स्त्रियां रोती हुई लौटेंगी”। और देव-योग से दूल्हे की पैर फिसलने से मृत्यु हो गयी और वे स्त्रियां रोती हुई वापस आयी। आपका भविष्य विषयक ज्ञान देखकर सभी श्रावकों की धर्म भावना में वृद्धि हुई।

एक समय गणदेव नामक एक श्रावक सुवर्ण सिद्धि की प्राप्ति के प्रयोजन से गणि जी की सेवा में आया। परन्तु आपके उपदेश से अल्प समय में ही विरक्त होकर सुवर्ण सिद्धि का लोभ त्याग दिया। गणदेव की योग्यता जानकार गणि जी ने उसे वागड़ देश में विधि-मार्ग के प्रचार के लिए भेज दिया।

मरुकोट्ट में आपने उपदेशमाला ग्रन्थ की  “संवच्छर मुस भाजिणो” इस गाथा की व्याख्या 6 मास तक की। इससे ऐसा मालूम होता है की आप प्रवचन शक्ति में भी अनुपम प्रतिभा के धारक थे।

आचार्य देवभद्रसूरि के अनुसार श्री जिनवल्लभसूरि युगप्रधान थे।  


क्रमांक 6 – आचार्य जिनवल्लभसूरि

संकलन – सरला बोथरा

आधार – स्व. महोपाध्याय विनयसागरजी रचित खरतरगच्छ का बृहद इतिहास