आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय)

खरतरगच्छ के प्रारंभिक काल में 11वीं सदी में आचार्य वर्धमानसूरि के शिष्य जिनेश्वरसूरि हुए, जिन्होंने दुर्लभराज की सभा में “खरतर” विरुद प्राप्त किया था। उसी परंपरा में 13वीं सदी में आचार्य जिनपतिसूरि के पाट पर जिनेश्वरसूरि हुए जिन्हें आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के नाम से सम्बोधित किया गया। आप एक महान शासन-प्रभावक आचार्य हुए। आपके कर-कमलों से बहुत अधिक जिन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठाएँ एवं मुमुक्षुओं की दीक्षाएँ हुईं।

आप मारवाड़ में मारोठ निवासी श्रावक-रत्न नेमिचन्द्र भाण्डागारिक के सुपुत्र थे। जिनपतिसूरि के भक्त नेमिचन्द्र एक दानवीर और विद्वान् साहित्यकार थे। नेमिचन्द्र द्वारा रचित अनेक ग्रंथों में से “षष्टिशतक” ग्रन्थ श्वेताम्बर और दिगंबर दोनों परम्पराओं में मान्य होने के कारण विशेष उल्लेखनीय है। अगरचंदजी नाहटा के अनुसार श्वेताम्बर परंपरा में श्रावक द्वारा रचित किसी भी ग्रन्थ की इतनी अधिक टीकाएँ नहीं हुई।

सम्वत 1245 मार्गशीर्ष सुदि 11 के दिन जिनेश्वरसूरि का जन्म हुआ। अम्बिका देवी के स्वप्न अनुसार आपका जन्म नाम अम्बड़ रखा गया। सम्वत 1258 में चैत्र वदी 2 को खेड़नगर के भगवान शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा के अवसर पर आचार्य जिनपतिसूरि के कर-कमलों से आपकी दीक्षा हुई और दीक्षा नाम वीरप्रभ रखा गया।

सम्वत 1278 माघ सुदि 6 के दिन जालोर के महावीर जिनालय में सर्वदेवसूरि ने वीरप्रभ गणि को आचार्य पद से अलंकृत कर जिनपतिसूरि के पट्ट पर बिराजमान किया। और आपका नाम परिवर्तन कर जिनेश्वरसूरि रखा गया। यह पाट महोत्सव अनेक दृष्टियों से अनुपम हुआ था। इस शुभ अवसर पर देश-देशान्तरों से आये हुए धनी-मानी लोगों द्वारा गरीबों के लिए सदावर्त खोले गए, याचकों के मनोरथ पूरे किये गए और अमारी घोषणा की गई। भाट लोग खरतरगच्छ की विरुदावली पढ़ रहे थे। इस प्रभावना को देखकर जैनेत्तर लोग शासन की प्रशंसा करने लगे।

सम्वत 1289 में जिनेश्वरसूरि ने ठाकुर अश्वराज और श्रेष्ठि राल्हा के साथ उज्जयंत (गिरनार), शत्रुंजय, स्तंभनक (खम्भात) इन प्रधान तीर्थों की यात्रा की। खम्भात में वादी यमदण्ड नाम के दिगंबर पंडित के साथ पूज्यश्री का विद्वतापूर्ण वार्तालाप हुआ। वहीं पर गुजरात के सोलंकी राजा वीरध्वज के प्रसिद्ध महामंत्री वस्तुपाल अपने परिवार सहित नगर प्रवेश के समय पूज्यश्री के सम्मुख आये। जिससे जिन-शासन की अच्छी प्रभावना हुई।

सम्वत 1298 में आपके सान्निध्य में जालौर के महामंत्री कुलधर ने जिनालय में स्वर्णदण्ड पर ध्वजारोपण किया। यही महामंत्री कुलधर वैराग्यवासित होकर सम्वत 1299 में जिनेश्वरसूरि से दीक्षित हुए। दीक्षा के बाद मंत्रीजी का नाम कुलतिलक मुनि रखा गया। इतने बड़े वैभवशाली, राजनीति में कुशल मंत्री को साधु बनते देखकर लोगों के आश्चर्य की सीमा नहीं रही।

सम्वत 1319 में जिनेश्वरसूरि के शिष्य उपाध्याय अभयतिलक का तपागच्छ के पंडित विद्यानंद के साथ उज्जैन में वाद-विवाद हुआ। “प्रासुक (अचित्त) हुआ शीतल पानी यतिजनों को कल्पनीय है” इस तथ्य को अनेक सिद्धांतों के बल से अपने पक्ष का स्थापन कर उपा. अभयतिलक ने राजसभा में जय-पत्र प्राप्त किया।

जिनेश्वरसूरि के कर-कमलों से जालौर, पालनपुर, श्रीमाल नगर, बाड़मेर, जैसलमेर, चित्तौड़, बीजापुर आदि नगरों में बहुत अधिक संख्या में मुमुक्षओं की दीक्षाएँ, पदारोहण, मंदिरों की प्रतिष्ठाएँ, जिन प्रतिमाओं तथा जिनवल्लभसूरि / जिनदत्तसूरि / जिनपतिसूरि की गुरु मूर्तियों की स्थापना, स्वर्ण ध्वजदंड एवं कलश का आरोपण, ध्वजारोहण आदि कार्य हुए। पूज्यश्री द्वारा पालनपुर में प्रतिष्ठित – शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा आज पाटण के तथा ऋषभदेव भगवान की दो प्रतिमाएँ आज घोघा के जैन मंदिर में विद्यमान है।

जिनेश्वरसूरि के पिता एवं गुरु अच्छे लेखक थे – अतः आपमें सृजनात्मक क्षमता जन्मजात संस्कारगत थी। पूज्यश्री ने अनेक ग्रंथों की रचना की और अन्य लेखकों के ग्रंथों को संशोधित भी किया। आपके द्वारा रचित कुछ ग्रंथों के नाम – श्रावकधर्मविधि प्रकरण, आत्मानुशासन, द्वादशभावना कुलक, पालनपुर वासुपूज्य बोली आदि। जिनरत्नसूरि लक्ष्मीतिलक रचित 10130 श्लोक प्रमाण महाकाव्य “प्रत्येक बुद्ध चरित” का संशोधन भी आपने ही किया।

एक दिन जिनेश्वरसूरि ने अपना निधन-काल निकट जानकर वाचनाचार्य प्रबोधमूर्ति गणि को अपने पाट पर स्वहस्त से स्थापित कर उनका नाम जिनप्रबोधसूरि रखा। अनेक प्रकार से शासन प्रभावना करते हुए सम्वत 1331 में आपका स्वर्गवास हुआ। श्रेष्ठि क्षेमसिंह ने पूज्यश्री के चिता-स्थान पर एक सुन्दर स्तूप बनाया।


क्रमांक 11 – आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) 
संकलन – सरला बोथरा
आधार – प. पू. मुनि श्री चंद्रप्रभसागरजी म. सा. रचित खरतरगच्छ का आदिकालीन इतिहास

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