दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि

दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि के पट्टधर, सूर्य के समान तेजस्वी आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि, मणिधारी दादा गुरुदेव के नाम से जाने जाते हैं। असाधारण व्यक्तित्व एवं लोकोत्तर प्रभाव के कारण अल्प आयु में जो प्रसिद्धि आपने प्राप्त की वह परमात्मा महावीर के शासन के स्वर्णिम इतिहास का एक अनूठा अध्याय है।

एक बार श्री जिनदत्तसूरि लौद्रवपुर उपाश्रय में बिराजमान थे। उस समय उनकी आयु लगभग 65 वर्ष की थी। कुछ श्रावकों ने जिज्ञासा वश गुरुदेव से पूछा कि आपका पट्टधर कौन होगा। गुरुदेव ने उत्तर दिया कि उनका अभी जन्म नहीं हुआ है। यह उत्तर सुनकर श्रावक आश्चर्यचकित हो गए। तब जिनदत्तसूरि ने उन्हें बताया कि विक्रमपुर नगर (जैसलमेर के निकट) के साह रासलजी की धर्मपत्नी देल्हण देवी के उदर से शीघ्र ही उनका जन्म होगा। गुरुदेव की बात सुनकर रामदेव आदि श्रावक श्राविका माता देल्हण देवी और गर्भस्थ मणिधारीजी को वंदन करने के लिए विक्रमपुर नगर पहुंचे। रासल साह के घर पहुंचकर उन्होंने माता देल्हण देवी को हार पहनाकर एवं चरण प्रक्षालन आदि करके पुष्पांजलि अर्पित की।

कुछ समय पश्चात आपका जन्म सम्वत 1197 भाद्रपद शुक्ल 8 के दिन विक्रमपुर में हुआ। आपका जन्म नाम सूर्यकुमार था और आप महतीयाण गोत्रीय थे। तेजस्वी बालक सूर्यकुमार को धार्मिक संस्कार जन्म से ही विरासत में प्राप्त हुए। संयोगवश विक्रमपुर में जंगम युगप्रधान जिनदत्तसूरि का चातुर्मास हुआ। देल्हण देवी बालक सूर्यकुमार के साथ नित्य गुरुदेव के प्रवचन सुनने जाती थी। सूर्यकुमार का मन इतनी कम आयु होते हुए भी विरक्ति की ओर अग्रसर होने लगा। गुरुदेव ने बालक के अन्तर्हित शुभ लक्षणों को देखकर ज्ञानबल से जान लिया कि यह प्रतिभा-संपन्न बालक सर्वथा मेरे पट्ट के योग्य है।

तदनन्तर सम्वत 1203 फागुन शुक्ल 9 के दिन अजमेर के श्री पार्श्वनाथ भगवान के विधि चैत्य में 6 वर्ष के बालक सूर्यकुमार की दीक्षा हुई। 2 वर्ष के कम समय में ही आपने कड़े परिश्रम से अद्भुत ज्ञानोपार्जन किया। फलतः आपकी असाधारण मेधा, तीक्ष्ण बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित हो कर 8 वर्ष की अल्प आयु में सम्वत 1205 में वैशाख शुक्ल 6 के दिन आचार्य जिनदत्तसूरि ने आपको आचार्यपद प्रदान कर श्री जिनचंद्रसूरि के नाम से प्रसिद्ध किया। आचार्य पद का यह महोत्सव विक्रमपुर के श्री महावीर जिनालय में आपके पिता मंत्री रासलजी ने भव्य समारोह के साथ किया।

आचार्य पदवी के पश्चात जिनचंद्रसूरि ने दादा जिनदत्तसूरि के सान्निध्य में रहकर शास्त्रों के ज्ञान के साथ गच्छ संचालन आदि की कई शिक्षाएं प्राप्त की। जिनदत्तसूरि ने अपने विनयी शिष्य जिनचंद्रसूरि को विशेष रूप से कहा कि आप योगिनीपुर (दिल्ली) कभी मत जाना। क्योंकि गुरुदेव जानते थे कि वहां जाने पर जिनचंद्रसूरि को अल्पायु योग है। सम्वत 1211 में जिनदत्तसूरि के स्वर्गवास के बाद गच्छ के संचालन और विकास का उत्तरदायित्व आपके कंधो पर आ गया।

गच्छ-भार को वहन करते हुए आपने विविध गाँवों एवं नगरों में विहार कर धर्म-प्रचार किया। फलस्वरूप आपके उपदेश से प्रभावित होकर कई श्रावक-श्राविकाओं ने दीक्षा ग्रहण की। सम्वत 1217 में आपने मथुरा में जिनपतिसूरि आदि को दीक्षित किया। आपके हस्ते उच्चानगरी, बब्बेरक ग्राम आदि में कई दीक्षाएँ हुई और साधु-साध्वियों की संख्या बढ़ने लगी।

आचार्य जिनचंद्रसूरि ने त्रिभुवनगिरि में श्री शांतिनाथ प्रासाद में, मरुकोट में श्री चंद्रप्रभस्वामी विधि-चैत्य में, इन्द्रपुर में पार्श्वनाथ भुवन में बड़े ठाठ-बाट के साथ सुवर्ण-कलश एवं सुवर्णमय ध्वज-दंड का आरोपण किया। तथा सागरपाड़ा में श्री पार्श्वनाथ विधि-चैत्य एवं महावन में श्री अजितनाथ भगवान के मंदिर की प्रतिष्ठा की।

एक समय नरपालपुर में ज्योतिष-शास्त्र के ज्ञान से गर्वित एक ज्योतिषि के साथ आचार्यश्री का वाद-प्रतिवाद हुआ। गुरुदेव ने कहा – “चर – स्थिर – द्विस्वभाव इन तीन स्वभाव वाले लग्नों में से किसी लग्न का प्रभाव दिखाओ।” जब ज्योतिषी ने ऐसा करने से मना कर दिया तब गुरुदेव ने कहा – “स्थिर स्वभाव वाले वृष लग्न की स्थिरता का प्रभाव देखिये। वृष लग्न के 19 से 30 अंशों तक के समय में और मृगशीर्ष मुहूर्त में अमावस्या के दिन श्री पार्श्वनाथ स्वामी के मंदिर के सामने एक शिला स्थापित की है। यह 176 वर्षों तक स्थिर रहेगी।” ऐसा कहकर ज्योतिषि को जीत लिया और वह लज्जित होकर अपने स्थान को गया।  

जिनचंद्रसूरि का रुद्रपल्ली में चैत्यवासी मठाधीश पद्मचंद्राचार्य के साथ “अन्धकार द्रव्य है या नहीं” इस विषय पर राज सभा में शास्त्रार्थ हुआ। उसमें गुरुदेव विजयी रहे और आपके भक्त श्रावकों को “जयति-हट्ट” इस नाम से प्रसिद्धि मिली। तथा पद्मचंद्राचार्य के भक्त उपहास के पात्र बनकर “तर्क-हट्ट” इस नाम से जाने गए।

एक बार यशस्वी आचार्य जिनचंद्रसूरि संघ के साथ जब दिल्ली की तरफ विहार कर रहे थे तब चोरसिंदानक ग्राम के पास संघ ने अपना पड़ाव डाला। उसी समय संघ को यह मालूम हुआ कि मलेच्छों की सेना इस तरफ ही आ रही है। यह बात जानकार वह सभी भयभीत हो गए। उन्हें घबराया हुआ देखकर गुरुदेव ने कहा कि “आप सब निश्चिंत रहें, प्रभु श्री जिनदत्तसूरि महाराज सबकी रक्षा करेंगे। अपने ऊँट, बैल आदि चतुष्पदों को एकत्रित कर लो।” इसके बाद पूज्यश्री ने मंत्र-ध्यान पूर्वक अपने दंड से संघ के पड़ाव के चारों और कोटाकार रेखा खींच दी। उसके प्रभाव से संघ ने मलेच्छों को जाते हुए देखा परन्तु मलेच्छ सेना की दृष्टि संघ पर तनिक भी नहीं पड़ी। उसके पश्चात संघ के समस्त लोग निर्भय हो कर आगे चले।

दिल्ली के संघ को यह बात पता चली की जिनचंद्रसूरि संघ के साथ विहार करते हुए दिल्ली के निकट पहुंचे हैं। तब वहां के श्रेष्ठिगण ठाकुर नोहट, सेठ पालण, सेठ कुलचंद्र आदि अपने परिवार को लेकर सुसज्जित होकर हाथी, घोड़े, पालखी में चढ़कर गुरुदेव के दर्शनार्थ नगर के बाहर जाने लगे। अपने महल की छत पर बैठे हुए दिल्ली नरेश मदनपाल ने यह दृश्य देखकर अपने मंत्रियों से इस बारे में पूछा। मंत्रियों ने बताया कि अत्यंत सुन्दर आकृति वाले तथा अनेक शक्ति-संपन्न इनके गुरु पधारे हैं। महाराजा मदनपाल के मन में भी गुरुदेव के दर्शन की अभिलाषा हुई और वह राजसी ठाठ बाट के साथ जिनचंद्रसूरि जहां विराजमान थे वहां पर पहुंचे।

गुरुदेव का धर्मोपदेश सुनकर मदनपाल बहुत प्रभावित हुए और आपसे दिल्ली पधारने की विनति की। जिनचंद्रसूरि अपने श्रद्धेय गुरु जिनदत्तसूरि के दिए हुए अंतिम उपदेश को स्मरण करते हुए दिल्ली में प्रवेश न करने की दृष्टि से मौन रहे। उन्हें मौन देखकर पुनः राजा ने विशेष अनुरोध किया। जिनदत्तसूरि के उपदेश को त्यागने की मानसिक पीड़ा आपको अवश्य थी, परन्तु भावी के वश होकर आचार्यश्री को दिल्ली नगर में पदार्पण करना ही पड़ा। अभूतपूर्व समारोह के साथ जिनचंद्रसूरि का प्रवेश हुआ जिसमें स्वयं दिल्लीपति महाराज मदनपाल अपनी बाँह पकड़ाये हुए गुरुदेव के आगे चल रहे थे।

इस प्रकार वहां रहते हुए कई दिन बीत गए। एक बार कृपालु गुरुदेव ने भक्त श्रेष्ठि कुलचंद्र की अर्थ-दुर्बलता को देखकर केसर, कस्तूरी, गोरोचन आदि सुगंधित पदार्थों की स्याही से मंत्राक्षर लिखकर एक यन्त्रपट्ट दिया और कहा – “कुलचंद्र! इस यन्त्रपट्ट का अपनी मुट्ठी भर अष्ट गंध चूर्ण से प्रतिदिन पूजन करना। यंत्र पर चढ़ा हुआ यह चूर्ण पारे आदि के संयोग से सुवर्ण बन जाएगा।” पूज्यश्री की बताई हुई विधि अनुसार यंत्र की पूजा करने से श्रेष्ठि कुलचंद्र कालांतर में धनवान हो गये।

नवरात्र की नवमी के दिन जिनचंद्रसूरि दिल्ली नगर के उत्तर द्वार होकर बहिर्भूमिका के लिये जा रहे थे। मार्ग में मांस के लिए लड़ती हुई दो मिथ्या-दृष्टि देवियों को आपने देखा। उनमें से अधिगाली नामक देवी को प्रतिबोध देकर मांस आदि का त्याग करवाया। और उस देवी को पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर में स्थान दिया एवं अधिष्ठातृ का नाम अतिबल रखा।

दिल्ली में कुछ समय तक आपने अपने उपदेशों से भव्य जीवों का कल्याण करते हुए आयुशेष निकट जानकर सम्वत 1223 में भाद्रपद कृष्ण 14 को चतुर्विध संघ से क्षमा याचना की एवं अनशन आराधना के पश्चात आप स्वर्ग सिधारे। अंतिम समय में आपने श्रावकों के समक्ष यह भविष्यवाणी की कि “नगर से जितनी दूर मेरा देह-संस्कार किया जायेगा, नगर की बसती उतनी दूर तक बढ़ती जाएगी।”

इस सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि आचार्यश्री ने अपने स्वर्गवास के पूर्व संघ को आदेश दिया था कि “मेरे विमान (रथी) को बीच में कहीं विश्राम मत देना।” शोकाकुल संघ ने इस आदेश को भूलकर बीच में ही पूर्व प्रथानुसार विश्राम दे दिया। इसके पश्चात बहुत प्रत्यन करने पर भी विमान अपनी जगह से नहीं हिला तथा हाथी के द्वारा उठाने का प्रयास भी असफल रहा। इस चमत्कार पूर्ण घटना के कारण गुरुदेव का अग्नि-संस्कार उसी स्थान पर किया गया। यह स्थान आजकल महरौली में बड़ी दादावाड़ी के नाम से प्रसिद्द है।

दादा गुरुदेव जिनचंद्रसूरि के ललाट में मणि थी और इसलिए आप मणिधारी के नाम से जाने जाते हैं। पट्टावली में यह उल्लेख मिलता है कि आपने अंत समय में श्रावकों से कहा था कि अग्नि-संस्कार के समय मेरी देह के निकट दूध का पात्र रखना जिससे वह मणि निकलकर उसमें आ जायगी। किन्तु गुरु वियोग की व्याकुलता से श्रावक-गण ऐसा करना भूल गए। एक योगी को यह बात किसी तरह ज्ञात हो गयी और उसने उक्त विधि से वह मणि प्राप्त कर ली। उस योगी ने अपनी वृद्धावस्था में जिनचंद्रसूरि के पट्ट्धर जिनपतिसूरि को उन्हीं के अनुसार अतिशययुक्त मानकर वह मणि सौंप दी। बाद में वह मणि कहाँ गयी इसका कुछ पता नहीं लगता।

मणिधारी जिनचन्द्रसूरि ने राजपूत क्षत्रियों को प्रतिबोध देकर उन्हें अहिंसा के मार्ग का अनुयायी बनाया। जिनचन्द्रसूरि ने सम्वत 1214 में सिंध देश के राजा गोशलसिंह भाटी को जैन बनाया और आधरिया गोत्र स्थापित किया। गोशलसिंह के साथ 1500 घरों ने जैन धर्म अंगीकार किया।

सम्वत 1215 में गढ़ सिवाना के राठोड रामदेव के पुत्र काजल ने जिनचंद्रसूरि से स्वर्ण-सिद्धि की वास्तविकता प्रत्यक्षः बताने का निवेदन किया। मणिधारीजी ने उसे लक्ष्मी-मन्त्र से अभिमंत्रित वासक्षेप देकर कहा कि इसे तुम जिस चीज़ पर भी डालोगे वह सोने की हो जाएगी। काजल ने वासक्षेप को घर के छज्जों पर डाला और वह स्वर्णमय हो गए। इससे काजल बहुत प्रभावित हुआ और गुरुदेव के प्रति श्रद्धावान हो गया। इस प्रकार आचार्यश्री ने छाजेहड़ (छाजेड़) गोत्र की स्थापना की।

गुरुदेव ने सम्वत 1215 में सालमसिंह दइया को प्रतिबोधित किया। तथा सियालकोट में सालेचा-वोहरा गोत्र प्रसिद्द हुआ। सम्वत 1217 में मेवाड़ के आघाट गाँव में भूत-प्रेत बाधा मिटाकर वहां के खीची राजा सूरदेव के पुत्र दूगड़-सुगड़ को जैन बनाया और उन्ही के नाम से गोत्र स्थापित किये। सीसोदिया वैरिशाल ने भी श्रावक व्रत स्वीकारा और इनके वंशज सीसोदिया कहलाये। उसी समय खेताणी और कोठारी गोत्र की भी स्थापना हुई।

मेवाड़ के मोहीपुर नरेश नारायणसिंह पमार के पुत्र गंगा ने युद्ध में स्वयं को परास्त होते देख मणिधारीजी की शरण ली। गुरुदेव ने गंगा को शरणागत समझकर दैविक सहायता प्रदान की जिससे मोहीपुर नरेश की विजय हुई। राजा एवं उसके 16 पुत्रों ने आचार्यश्री से सम्यक्त्व मूल बारह व्रत स्वीकार किये और गुरुदेव ने उनके वंशजों की लिये निम्न गोत्र स्थापित किये – गांग, पालावत, दुधेरिया, गोढ़, गिडिया, बांभी, गोढ़वाड़, थराबना, खुरधा, पटवा, टोडरवाल, भाटिया, आलावात, मोहीवाल, वीरावत। जिनचन्द्रसूरि ने मंत्रिदलीय (महतियाण) ज्ञाति की स्थापना कर जिनशासन की प्रभावना की। श्रीमाल गोत्र का पुनरुद्धार एवं पुनर्स्थापन भी आचार्यश्री के कर-कमलों से ही हुआ था।

साहित्य में आपके द्वारा रचित “व्यवस्था-शिक्षा-कुलक” नामक एक ही कृति उपलब्ध है। अल्प अवस्था में भी जिनचन्द्रसूरि न्याय-दर्शन के असाधारण विद्वान् थे। आप प्रतिवादियों के लिये “पंचानन” (पंचमुखी) के सामान थे ऐसा कहा जाता है। गुरुदेव द्वारा प्रतिष्ठित मरुकोट्ट नगर के चन्द्रप्रभ जिनालय की प्रशस्ति में इनके लिये “वादिगजकेसरी” विशेषण का उपयोग किया गया है। मणिधारी जिनचन्द्रसूरि एक अलौकिक प्रतिभा सम्पन्न आचार्य थे। अतः खरतरगच्छ में प्रति चौथे पट्टधर का नाम जिनचन्द्रसूरि रखने की परंपरा प्रारम्भ हुई।

छोटी उम्र की बड़ी सफलता यही मणिधारीजी के व्यक्तित्व की विशेषता है।  


क्रमांक 8 – दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि

संकलन – सरला बोथरा

आधार – स्व. महोपाध्याय विनयसागरजी रचित खरतरगच्छ का बृहद इतिहास  

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