आचार्य जिनप्रबोधसूरि के पट्ट पर जिनचन्द्रसूरि हुए। आप “कलिकाल केवली” के विरुद से सम्मानित थे। आपने विभिन्न वादियों पर विजय प्राप्त की थी।

दादा जिनकुशलसूरि रचित “जिनचन्द्रसूरि चतुः सप्ततिका” के अनुसार आप समियाणा (सिवाणा) के मंत्री छाजेड़ गोत्रीय देवराज की धर्मपत्नी कोमलदेवी के सुपुत्र थे। आपका जन्म सम्वत 1324 मार्गशीर्ष सुदि 4 को हुआ। आपका जन्म नाम खंभराय (स्तंभराज) था। आप दादा जिनकुशलसूरि के सांसारिक काका थे।

8 वर्ष की आयु में जिनप्रबोधसूरि की देशना सुनकर आपको वैराग्य उत्पन्न हुआ। सम्वत 1332 ज्येष्ठ सुदि 3 को आपकी दीक्षा जिनप्रबोधसूरि के हस्ते हुई और आपका नाम क्षेमकीर्ति रखा गया। पूज्यश्री के विद्या गुरु विवेकसमुद्र गणि थे। व्याकरण, न्याय-शास्त्र, नाट्य-शास्त्र, सप्तनय, सप्तभंगी आदि सभी विद्याओं में आप पारंगत हुए। सम्वत 1341 में अक्षय तृतीया के दिन जालौर में जिनप्रबोधसूरि ने अपने निधन के पूर्व आपको अपने पट्ट पर स्थापित कर जिनचन्द्रसूरि नाम दिया। इस प्रकार 17 वर्ष की अल्पायु में ही गच्छ के संचालन का भार आपके ऊपर आ गया।

आपके कर-कमलों से जालौर, जैसलमेर, खम्भात, पालनपुर, पाटण, बीजापुर, भीमपल्ली, स्वर्णगिरि आदि नगरों में अनेक दीक्षाएँ, पदारोहण, जिन प्रतिमाओं तथा गुरु मूर्तियों की स्थापना आदि कार्य हुए। सम्वत 1342 में जालौर में 27 अंगुल प्रमाण वाली स्फटिकादि रत्नमय अजितनाथ स्वामी की मूर्ति सहित अन्य जिन बिम्बों के प्रतिष्ठा महोत्सव में महाराज सामन्तसिंह स्वयं उपस्थित थे। सम्वत 1351 में पालनपुर के ऋषभदेव स्वामी के विधि-चैत्य में 640 प्रतिमाओं का प्रतिष्ठा महोत्सव मंत्री तिहुण, श्रेष्ठि बीजा आदि ने जिनचन्द्रसूरि के सान्निध्य में करवाया।

सम्वत 1356 में जैसलमेर प्रवेश के समय पूज्यश्री का स्वागत करने के लिए राजा जैतसिंह 4 कोस सम्मुख आये थे। सिवाणा के राजा सोमेश्वर चौहान ने भी खूब ठाट बाट से आपका प्रवेशोत्सव कराया था। गुरुदेव का खम्भात प्रवेश महोत्सव वैसा ही हुआ जैसा जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के पधारने पर महामंत्री वस्तुपाल ने करवाया था। आपके अनेक प्रवेश महोत्सव स्वपक्षीय तथा परपक्षीय सभी लोगों के मन में चमत्कार पैदा करने वाले हुए, जिससे विधिमार्ग की खूब उत्तम प्रभावना हुई।

आचार्यश्री के समय दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात और राजस्थान के राजाओं पर विजय हेतु कई युद्ध किये। उस समय देश में म्लेच्छों का प्रबल उपद्रव होते हुए भी गुरुदेव के सान्निध्य में अनेक तीर्थों की भव्य यात्राएं हुई। सम्वत 1366 में खम्भात के सेठ जैसल ने तथा सम्वत 1367 में भीमपल्ली से सेठ सामल ने अनेकों नगरों से आए संघों को साथ लेकर शत्रुंजय, गिरनार आदि तीर्थों की यात्रा करवाई। पूज्यश्री ने संघ सहित तीन बार फलवर्द्धिका पार्श्वनाथ तीर्थ की यात्रा की।

सम्वत 1375 में मंत्रिदलीय (महतियाण) ज्ञाति के ठाकुर अचलसिंह ने अनेक नगरों में कुंकुम पत्री भेजकर हस्तिनापुर एवं मथुरा तीर्थों की यात्रा के लिए विशाल समुदाय को नागौर में एकत्रित किया। अचलसिंह ने अलाउद्दीन के पुत्र सुल्तान क़ुतुबुद्दीन से सवर्त्र निर्विरोध यात्रा के लिए फरमान निकलवाया। इस यात्रा में 400 घोड़े, 500 गाड़े, 700 बैल आदि गणातीत मनुष्यों का समुदाय चक्रवर्ती राजा की सेना के समान प्रतीत हो रहा था। श्रीमाल वंश भूषण गणितज्ञ ठक्कर फेरु भी यात्रा में सम्मिलित हुए थे।

यात्री संघ जब तिलपथ नामक स्थान पर पहुंचा, तब ईर्ष्यावश होकर चैत्यवासी द्रमकपुरीय आचार्य ने सुल्तान क़ुतुबुद्दीन के कान भर दिए कि जिनचन्द्रसूरि आपकी आज्ञा के बिना ही सोने का छत्र धारण करते हैं और सिंहासन पर बैठते हैं। यह संवाद सुनते ही सुल्तान ने संघ को रोक दिया। परन्तु राजकीय अधिकारीयों द्वारा जांच करने पर गुरुदेव को निर्दोष पाया गया। अतएव द्रमकपुरीय आचार्य को कारागार में डाल दिया गया और गुरुदेव को संघ सहित विचरण करने की अनुमति मिल गयी। परन्तु समभाव रखने वाले दयालु गुरुदेव ने द्रमकपुरीय आचार्य को कारागार से मुक्त करवाकर ही आगे प्रस्थान किया। यह देखकर सभी लोग अत्यंत प्रभावित हुए और गुरुदेव की बहुत प्रशंसा हुई।

जिनचन्द्रसूरि ने म्लेच्छों से संकुल सिंध प्रान्त के देवराजपुर (देराउर) में दो चातुर्मास किये थे। वहां पर राजचन्द्र मुनि का आचार्य पद, अनेक दीक्षाएँ, मालारोपण आदि महोत्सव हुए। गुरुदेव ने खंड सराय चातुर्मास के समय योगिनीपुर (दिल्ली) जाकर मणिधारी दादा जिनचन्द्रसूरि के स्तूप की दो बार यात्रा की।

अपना अंत समय निकट जानकार आचार्य जिनचन्द्रसूरि ने राजेंद्रचंद्रसूरि को पत्र लिखकर कुशलकीर्ति गणि को अपने पट्ट पर स्थापित कर जिनकुशलसूरि नामकरण करने का आदेश दिया। सम्वत 1376 आषाढ़ सुदी 9 के दिन कोसवाणा नगर में आपका स्वर्गवास हुआ। “जिनचन्द्रसूरि चतुः सप्ततिका” में अपने पूज्य गुरुदेव के गुणों का वर्णन करते हुए दादा जिनकुशलसूरि लिखते हैं –


“लब्धि से आप गौतमस्वामी वत् और रूपादि गुणों से वज्रस्वामी के समान और शील में स्थूलिभद्र सदृश तथा शासन प्रभावना करने में सुहस्ती सूरि जैसे हैं”


क्रमांक 13 – कलिकाल केवली जिनचन्द्रसूरि

संकलन – सरला बोथरा

आधार – स्व. महोपाध्याय विनयसागरजी रचित खरतरगच्छ का बृहद इतिहास