दादा गुरुदेव जिनदत्तसूरि

भगवान महावीर की धर्म-परंपरा को जीवित एवं विशुद्ध बनाये रखने के लिए समय समय पर अनेक अमृत-पुरुष हुए। उनमें आचार्य जिनदत्तसूरि जैसे नवयुग प्रवर्त्तक महापुरुष की गणना होती है। श्री जिनदत्तसूरि जैन धर्म और उसकी खरतरगच्छीय परंपरा के एक ऐसे सुदृढ़ स्तम्भ थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, साधना और प्रकांड पांडित्य के बल पर समाज में … Read more

आचार्य जिनवल्लभसूरि

आचार्य अभयदेवसूरि के पट्ट पर जिनवल्लभसूरि हुए। वे मूलतः आशिका नगरी (हांसी) के निवासी थे। उनके पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे। अतः माता ने ही उनका पालन पोषण किया था। जब उनकी आयु पढ़ने योग्य हुई तब माता ने उन्हें कूर्चपुरगच्छीय चैत्यवासी जिनेश्वराचार्य के मठ में शिक्षा के लिए भेजा। आप बहुत … Read more

नवांगी टीकाकार आचार्य अभयदेवसूरि

संवेग रंगशाला के रचयिता श्री जिनचन्द्रसूरि के पट्टधर नवांगी टीकाकार श्री अभयदेवसूरि हुए। आपका जीवन वृतांत हमें “प्रभावक चरित्र” नामक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। आपके पिता का नाम श्रेष्ठी महीधर तथा माता का नाम धनदेवी था। मालवा प्रदेश की राजधानी धारा नगरी में संवत 1071 में आपका जन्म हुआ। संवत 1080 में आचार्य जिनेश्वरसूरि … Read more

संवेग रंगशाला के रचयिता आचार्य जिनचंद्रसूरि

आचार्य जिनेश्वरसूरि के पट्ट पर सूरियों में श्रेष्ठ श्री जिनचंद्रसूरि हुए। वे नवांगी टीकाकार अभयदेवसूरि के वरिष्ठ गुरुभ्राता थे। खरतरगच्छ की परंपरा में जिनचंद्रसूरि के नाम से अनेक प्रभावशाली आचार्य हुए। उनमें से प्रथम नाम “संवेग रंगशाला” के रचनाकार आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि का है। संवत 1125 में आचार्य अभयदेवसूरि के निवेदन पर सूरिजी ने अठारह … Read more

आचार्य बुद्धिसागरसूरि

आचार्य बुद्धिसागरसूरि मध्य देश के निवासी थे। उनके पिताजी का नाम कृष्ण था। इनका बचपन का नाम श्रीपति था और वे जिनेश्वरसूरि के भाई थे। दोनों ही भाई बड़े प्रतिभावान थे। उन्होंने छोटी उम्र में ही ब्राह्मणीय परंपरा के अनेक धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया। एक बार दोनों भाई देशाटन हेतु घूमते घूमते धारा नगरी … Read more

आचार्य जिनेश्वरसूरि

खरतर परंपरा जैन धर्म में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। इसका मूल कारण चैत्यवास का उन्मूलन और सुविहित मार्ग का प्रचार है। आज से लगभग 1000 वर्ष पहले आचार्य वर्धमानसूरि हुए। उन्होंने वेद विद्या सम्पन्न श्रीधर और श्रीपति बंधुओं को अपना शिष्य बनाया। उनका नाम जिनेश्वर और बुद्धिसागर रखा और क्रमशः आचार्य पद प्रदान किया। … Read more

आचार्य वर्धमानसूरि

लाखों को जैन बनानेवाला गच्छ, जिसमें चार दादा गुरुदेव जैसी महान विभूतियाँ हुई, उसकी शुरुआत कैसे हुई, आओ जानें। खरतर परंपरा श्रृंखला का आरम्भ खरतरगच्छ के प्रवर्तक आचार्य श्री जिनेश्वरसूरि के गुरु श्री वर्धमान सूरिजी के जीवन परिचय से करते हैं। आचार्य श्री वर्धमानसूरि चैत्यवासी जिनचंद्राचार्य के शिष्य थे। चैत्यवासी साधु शिथिलाचारी होने के कारण … Read more

दादा श्री जिनदत्तसूरि काव्यम्

दासानुदासा इव सर्वदेवा यदीय पदाब्जतले लुठंति मरुस्थलीकल्पतरुः स जीयात् युगप्रधानो जिनदत्तसूरिः  ।।१।। चिंतामणिः कल्पतरूर्वराकौ कुर्वन्ति भव्याः किमु कामगव्या प्रसीदतः श्रीजिनदत्त सूरे सर्वे पदा हस्तिपदे प्रविष्टाः  ।।२।। नो योगी न च योगिनी न च नराधीशश्च नो शाकिनी नो वेताल-पिशाच राक्षसगणा नो रोगशोकौ भयं नो मारी न च विग्रहप्रभृतयः प्रीत्या प्रणत्युच्चकैः यस्ते श्री जिनदत्तसूरिः गुरवे नामाक्षरं ध्यायति  … Read more