कलिकाल केवली जिनचन्द्रसूरि

आचार्य जिनप्रबोधसूरि के पट्ट पर जिनचन्द्रसूरि हुए। आप “कलिकाल केवली” के विरुद से सम्मानित थे। आपने विभिन्न वादियों पर विजय प्राप्त की थी। दादा जिनकुशलसूरि रचित “जिनचन्द्रसूरि चतुः सप्ततिका” के अनुसार आप समियाणा (सिवाणा) के मंत्री छाजेड़ गोत्रीय देवराज की धर्मपत्नी कोमलदेवी के सुपुत्र थे। आपका जन्म सम्वत 1324 मार्गशीर्ष सुदि 4 को हुआ। आपका … Read more

आचार्य जिनप्रबोधसूरि

आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के पट्ट पर जिनप्रबोधसूरि हुए। आप बड़े भारी विद्वान् और प्रभावक थे। विवेकसमुद्र गणि रचित “श्री जिनप्रबोधसूरि चतुः सप्ततिका” के अनुसार आपका जन्म गुजरात के थारापद्र नगर में ओसवाल साहू खींवड गोत्रीय श्रीचंद और उनकी पत्नी सिरिया देवी के यहाँ सम्वत 1285 में हुआ। आपका जन्म नाम मोहन था। सम्वत 1297 में … Read more

आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय)

खरतरगच्छ के प्रारंभिक काल में 11वीं सदी में आचार्य वर्धमानसूरि के शिष्य जिनेश्वरसूरि हुए, जिन्होंने दुर्लभराज की सभा में “खरतर” विरुद प्राप्त किया था। उसी परंपरा में 13वीं सदी में आचार्य जिनपतिसूरि के पाट पर जिनेश्वरसूरि हुए जिन्हें आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के नाम से सम्बोधित किया गया। आप एक महान शासन-प्रभावक आचार्य हुए। आपके कर-कमलों … Read more

उपाध्याय जिनपाल

महान वादजयी जिनपतिसूरि के शिष्य समुदाय में उपाध्याय जिनपाल प्रमुख थे। आपकी दीक्षा सम्वत 1225 में पुष्कर नगर में हुई। सम्वत 1269 में जालौर के विधिचैत्य में जिनपतिसूरि ने आपको उपाध्याय पद प्रदान किया। सम्वत 1273 में राजा पृथ्वीचन्द्र की राजसभा में जिनपतिसूरि की आज्ञा से उपाध्याय जिनपाल ने काश्मीरी पंडित मनोदानन्द के साथ शास्त्रार्थ … Read more

आचार्य जिनपतिसूरि

दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि के पट्टधर श्री जिनपतिसूरि हुए। आपका जन्म विक्रमपुर में मालू गोत्रीय यशोवर्धन की धर्मपत्नी सुहवदेवी की रत्नकुक्षि से सम्वत 1210 में हुआ। आपकी दीक्षा दादा जिनचंद्रसूरि के कर कमलों से सम्वत 1217 में हुई। आपका दीक्षा नाम नरपति था। सम्वत 1223 में बड़े महोत्सव के साथ जयदेवसूरि ने आपको आचार्य पद … Read more

दादा गुरुदेव मणिधारी जिनचंद्रसूरि

दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि जी के पट्टधर, सूर्य के समान तेजस्वी आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि, मणिधारी दादा गुरुदेव के नाम से जाने जाते हैं। असाधारण व्यक्तित्व एवं लोकोत्तर प्रभाव के कारण अल्प आयु में जो प्रसिद्धि आपने प्राप्त की वह परमात्मा महावीर के शासन के स्वर्णिम इतिहास का एक अनूठा अध्याय है। एक बार श्री जिनदत्तसूरि … Read more

दादा गुरुदेव जिनदत्तसूरि

भगवान महावीर की धर्म-परंपरा को जीवित एवं विशुद्ध बनाये रखने के लिए समय समय पर अनेक अमृत-पुरुष हुए। उनमें आचार्य जिनदत्तसूरि जैसे नवयुग प्रवर्त्तक महापुरुष की गणना होती है। श्री जिनदत्तसूरि जैन धर्म और उसकी खरतरगच्छीय परंपरा के एक ऐसे सुदृढ़ स्तम्भ थे जिन्होंने अपने व्यक्तित्व, साधना और प्रकांड पांडित्य के बल पर समाज में … Read more

आचार्य जिनवल्लभसूरि

आचार्य अभयदेवसूरि के पट्ट पर जिनवल्लभसूरि हुए। वे मूलतः आशिका नगरी (हांसी) के निवासी थे। उनके पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे। अतः माता ने ही उनका पालन पोषण किया था। जब उनकी आयु पढ़ने योग्य हुई तब माता ने उन्हें कूर्चपुरगच्छीय चैत्यवासी जिनेश्वराचार्य के मठ में शिक्षा के लिए भेजा। आप बहुत … Read more

नवांगी टीकाकार आचार्य अभयदेवसूरि

संवेग रंगशाला के रचयिता श्री जिनचन्द्रसूरि के पट्टधर नवांगी टीकाकार श्री अभयदेवसूरि हुए। आपका जीवन वृतांत हमें “प्रभावक चरित्र” नामक ग्रन्थ से प्राप्त होता है। आपके पिता का नाम श्रेष्ठी महीधर तथा माता का नाम धनदेवी था। मालवा प्रदेश की राजधानी धारा नगरी में संवत 1071 में आपका जन्म हुआ। संवत 1080 में आचार्य जिनेश्वरसूरि … Read more

संवेग रंगशाला के रचयिता आचार्य जिनचंद्रसूरि

आचार्य जिनेश्वरसूरि के पट्ट पर सूरियों में श्रेष्ठ श्री जिनचंद्रसूरि हुए। वे नवांगी टीकाकार अभयदेवसूरि के वरिष्ठ गुरुभ्राता थे। खरतरगच्छ की परंपरा में जिनचंद्रसूरि के नाम से अनेक प्रभावशाली आचार्य हुए। उनमें से प्रथम नाम “संवेग रंगशाला” के रचनाकार आचार्य श्री जिनचंद्रसूरि का है। संवत 1125 में आचार्य अभयदेवसूरि के निवेदन पर सूरिजी ने अठारह … Read more